22 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 15

आयुर्वेदीय आहारविधी-7


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 22 Jun 2017 Views : 435
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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आयुर्वेदीय आहारविधी का सातवाँ नियम है - नातिद्रुतमश्नीयात्। अर्थात तेजी से आहार सेवन नही करना चाहिए।

क्यूँ? क्या होता है तेजी से आहार सेवन किया तो?

व्यवहार मे हम देखते है स्वामी विवेकानंद हो, परमहंस योगानंद हो या अन्य कोई महापुरुष - सभी ने किसी भी कार्य की सफलता के एकाग्रता को ही जरूरी बताया है और एकाग्रता भी तभी साधती है, जब मन/शरीर ......

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14 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 14

आयुर्वेदीय आहारविधी - 6


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 14 Jun 2017 Views : 1489
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आहार और मानसिक भाव

Diet & psychological factors

आयुर्वेदीय आहारविधी का छठवाँ नियम है - इष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं अश्नीयात

इष्टे देशे - अर्थात आहार सेवन करने का जो स्थान है वह इष्ट होना चाहिए। इष्ट मतलब मनोनुकूल, मन प्रसन्न करनेवाला। आहार का स्थान मन प्रसन्न तभी करेगा जब वह स्......

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08 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 13

आयुर्वेदीय आहारविधी - 5


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 08 Jun 2017 Views : 688
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आयुर्वेदीय आहारविधी का पाँचवा नियम है - वीर्याविरुद्धमश्नीयात।

अर्थात अविरूद्ध वीर्यवाले आहारद्रव्य/खाद्यपदार्थ एकसाथ ही खाने चाहिए। मतलब जिन दो खाद्यपदार्थों का वीर्य समान हो उन्हें ही साथ-साथ/ एकसाथ खा सकते है।

परंतु अब वीर्य मतलब क्या?

आयुर्वेदीय परिभाषा में वीर्य का मतलब Potency होता है। अर्थात किसी भी द्रव्य (Ma......

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06 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 12

आयुर्वेदीय आहारविधी - 4


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 634
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जीर्णे अश्नीयात -

आयुर्वेदीय आहारविधी का चौथा नियम है - जीर्णे अश्नीयात। अर्थात पहले सेवन किये हुए आहार का जब पूर्णरूप से पाचन हो जाये तभी पुनः भोजन करना चाहिए। मतलब भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। आहारकाल यह भोजनविधी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। शरीर को स्वस्थ बनाए रखनेवाले अनेक कारणों मे से भोजनकाल एक है। नियत समय पर भोजन करने से अन्नपचन निर्विघ्न......

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06 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 11

आयुर्वेदीय आहारविधी - 3


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 736
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आयुर्वेदीय आहारविधी का तिसरा नियम है - मात्राशी स्यात्। अर्थात आहार सदैव उचित मात्रा में ही लेना चाहिए। अब यह 'उचित मात्रा' (Optimum quantity) मतलब कितनी मात्रा? तो आयुर्वेद इसकी व्याख्या करता है 'अग्निबलापेक्षिणी' अर्थात प्रत्येक व्यक्ति की उचित मात्रा यह उस व्यक्ति के पाचकाग्नि के बल (ताकत) पर निर्भर करती है। इसीलिए सबके लिए एक ही मात्रा का निर्धार......

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