Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 27 Jul 2017 Views : 3800
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
27 Jul 2017 Views : 3800

लेख का शीर्षक पढने के बाद तो आप भौचक्के रह जाओगे की अब इसमे क्या समस्या है? ऐसा तो हम कई वर्षों से सेवन कर रहे है। पर समस्या यही है, क्यूँ की आप गलत परंपरा को सही मानकर चल रहे हो, जो आपके स्वास्थ को लाभ की जगह हानी पहुंचा रहा है। हो सकता है की आपके पिताजी, दादाजी या नानाजी भी पेट साफ करने की औषधी रात को सोते समय ही लेते रहे हो, परंतु इसका मतलब यह नही की वे सही ही हो।

हम जानते है की आयुर्वेदिक औषधियों का स्वभाव सौम्य होता है (कुछ अपवादात्मक औषधियाँ छोडकर)। इसीलिए उनका गलत उपयोग भी त्वरित गलत परिणाम नही दर्शाता। कभी महिने तो कभी वर्ष भी लग सकते है। इसीलिए आयुर्वेदिक औषधों के दुष्परिणाम अगर उत्पन्न भी हुए, तो भी दीर्घकाल के बाद उनकी उत्पत्ति होने के कारण एक सामान्य आदमी को वो दुष्परिणाम किस औषधि के है वो समझ नही आते। पेट साफ करने के लिए रात को सोते समय ली जानेवाली कोई भी औषधी इसी श्रेणी मे आती है।

कुछ वृद्ध रुग्ण ऐसे देखने मे आए है की जिन्हे सदैव कब्ज बना रहता है। इसी कब्ज के निवारण के लिए ये लोग सालोसाल मतलब 20-25 साल तक सतत कब्जहर चूर्ण लेते देखे गये है। परंतु दिन-प्रति-दिन इन्हे कब्जहर चूर्ण की मात्रा बढानी पडती है, तभी जाकर चूर्ण कुछ काम करता है, अन्यथा नही। फिर एक दिन ऐसा आता है की उन्हें कब्ज हर चूर्ण की ज्यादा मात्रा लेने के बाद भी पेट साफ नही होता। ऐसा क्यों?

इसका एकमात्र कारण है - औषधी सेवन का गलत समय

सभी लोग पेट साफ करने के लिए ली जानेवाली औषधी रात को सोते समय लेते है। परंतु आयुर्वेद मे तो ऐसा कही लिखा नही है। इसमे शोकांतिका यह है ज्यादातर वैद्य भी पेट साफ करने की औषधी लेने का निर्देश रात्री मे सोने से पहले ही देते है, जिससे यह गलत संकल्पना भी जनमानस मे दृढ हो गई की पेट साफ करने की औषधी रात को सोते समय ही लेनी चाहिए।

औषधियों के सेवनकाल के बारे मे आयुर्वेद के विचार अत्यंत स्पष्ट है। आयुर्वेद कहता है की अपानवायू की विकृति अर्थात कब्ज (constipation) मे भोजन के पहले औषधी देनी चाहिए अपानकाल मे दी हुई प्रत्येक औषधी अपानक्षेत्र पर कार्य करती है। इसीलिए अनुलोमन ( पेट साफ करना) करनेवाली कोई भी औषधी अपानकाल मे ही देनी चाहिए। परंतु आजकल अपानक्षेत्र मे काम करने के लिए औषधी स्वप्नकाल मे दी जाती है। स्वप्नकाल उदानवायू का एक विकल्प माना जाता है, अर्थात उदान के क्षेत्र मे औषधियों का काम करना जब अपेक्षित होता है तब औषधी 'स्वप्नकाल' मे ही प्रयुक्त की जाती है। इसीलिए स्वप्नकाल मे दी हुई अनुलोमक औषधी अपने उष्ण तीक्ष्ण गुणों से आंत्र रुक्षता एवं आंत्र दौर्बल्य तो इस हद तक पहुँचती है की बस्ती देने से भी रोगी को कोई लाभ नही होता। ऐसे रोगी बिना किसी अन्य बडे कारण के ही उदावर्त (severe constipation) के शिकार हो जाते है। यही उदावर्त बाद मे मानसरोगो को भी जन्म देता है। मतलब जीवनभर अनुसरण की हुई एक सामान्य सी गलती का परिणाम मनुष्य को बाद मे अंतिम श्वास तक भुगतना पडता है। इसीलिए पेट साफ करने के लिए औषधी सदैव भोजनपूर्व ही देना/लेना चाहिए।


अस्तु। शुभम भवतु।


© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत