06 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 12

आयुर्वेदीय आहारविधी - 4


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 650
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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जीर्णे अश्नीयात -

आयुर्वेदीय आहारविधी का चौथा नियम है - जीर्णे अश्नीयात। अर्थात पहले सेवन किये हुए आहार का जब पूर्णरूप से पाचन हो जाये तभी पुनः भोजन करना चाहिए। मतलब भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। आहारकाल यह भोजनविधी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। शरीर को स्वस्थ बनाए रखनेवाले अनेक कारणों मे से भोजनकाल एक है। नियत समय पर भोजन करने से अन्नपचन निर्विघ्न......

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06 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 11

आयुर्वेदीय आहारविधी - 3


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 746
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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आयुर्वेदीय आहारविधी का तिसरा नियम है - मात्राशी स्यात्। अर्थात आहार सदैव उचित मात्रा में ही लेना चाहिए। अब यह 'उचित मात्रा' (Optimum quantity) मतलब कितनी मात्रा? तो आयुर्वेद इसकी व्याख्या करता है 'अग्निबलापेक्षिणी' अर्थात प्रत्येक व्यक्ति की उचित मात्रा यह उस व्यक्ति के पाचकाग्नि के बल (ताकत) पर निर्भर करती है। इसीलिए सबके लिए एक ही मात्रा का निर्धार......

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06 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 10

आयुर्वेदीय आहारविधी भाग - 2


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 916
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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आहार में स्निग्ध पदार्थो का उपयोग : क्या सही क्या गलत?

आयुर्वेदीय आहारविधी का दूसरा नियम है स्निग्धं अश्नीयात् अर्थात भोजन मे सदैव स्निग्ध पदार्थ होना चाहिये। स्निग्ध अर्थात घी और तैल से बने पदार्थ, न कि घी या तैल मे तले हुये। कोई भी यंत्र सुचार......

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06 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 9

आयुर्वेदीय आहारविधी भाग-1


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 1351
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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आयुर्वेदीय आहारविधी भाग-1

उष्णं अश्नीयात्

आहारविधी एवं आहारनियमों के बारे मे आयुर्वेद मे जितना सूक्ष्मातिसूक्ष्म विचार किया गया है, शायद ही उतना किसी अन्य शास्त्र मे किया गया हो।......

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06 Jun 2017

स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 8

आयुर्वेदोक्त आहार संकल्पना


Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Jun 2017 Views : 770
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आयुर्वेदोक्त आहार संकल्पना

आहार जीवन का एक अभिन्न अंग है। जीवन परंपरा कायम बनाये रखने के लिए भोजन अति आवश्यक है।अगर आदमी को भूख ही नही लगती तो शायद संसार मे क्रिया कलाप ही न होता। इस भूख को संतुष्ट करने के लिए आहार परम आवश्यक है। पर यही आहार अगर विधिवत नही लिया जाता......

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