Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 04 Apr 2019 Views : 257
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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देसी गाय के दूध की वर्तमान वास्तविकता

दूध को पूर्णान्न माना जाता है। मतलब अगर आप अन्य कुछ अन्न खाये बिना सिर्फ दूध ही पीते रहे तो भी सुखपूर्वक जीवन का निर्वाह कर सकते हो, इसका यह अर्थ है। उसमे भी गाय का दूध सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। भारतवर्ष की संस्कृति में गाय को माता का दर्जा दिया गया है। क्योंकि की शिशु के जन्म के पश्चात दुर्दैववशात अगर शिशु की माता के आँचलो में दूध नही उतरता होगा, तो ऐसी स्थिति में बच्चे को गाय का दूध सात्म्य होने की वजह से पहले दिन से ही पिलाया जा सकता है। गाय का दूध भैस के दूध की तुलना में पचने में हल्का होता है, इसलिये नन्हे शिशु को जन्मतः गाय का दूध पिलाने से कोई नुकसान नही होता। गाय के दूध का संगठन माता के दूध जैसा ही होता है। परन्तु जैसे समय बदलता गया और पश्चिमी विचारसरणी हावी हुई, भारतीयों ने गाय का दूध छोड़कर भैंस का दूध अपना लिया। भैंस के दूध में ज्यादा फैट होते है, उससे घी ज्यादा मिलता है। इसलिये भैंस के दूध की मांग ज्यादा बढ़ी। ऊपर से भैस, गाय की तुलना में दूध भी ज्यादा देती है, जिससे आर्थिक लाभ ज्यादा मिलता है। इसलिये स्वातंत्र्योत्तर काल मे भारतीय परिवारों ने कई दशकों तक भैस के दूध को ही अपनाया था। परंतु जब भैस के दूध के दुष्प्रभाव (शरीर मे अधिक मात्रा में मेद संचित होना, शरीर की चपलता कम होना। बुद्धि भी भैस जैसी मंद होना। आलसी होना। भैंस के दूध से मनुष्य का मन अधिक तामसिक होता है। ऐसा कहते भी है कि बाल्यावस्था से भैस का दूध पीनेवाले बच्चों में बड़े होकर अपने माता-पिता के प्रति स्नेह-आदरकी भावना नही रहती) सामने आते गये, वैसे वैसे लोग फिर से गाय के दूध की ओर मुड़ने लगे। गाय के दूध की मांग बढ़ने लगी। परंतु अब समस्या यह उत्पन्न हुई कि गाय को पालना छोड़ने के बाद भैंस को अपनाने में इतना समय निकल गया कि नयी पीढ़ी के लोग वास्तविक देसी गाय को ही भूल गये की देसी गाय कैसी रहती है। इसलिये आज जब भी वैद्यगण रुग्णों को गाय का दूध पीने की सलाह देते है तो लोग गाय के दूध के नाम से मिलनेवाला जर्सी गाय का दूध लेकर आते है। उन्हें जर्सी गाय के दूध और देसी गाय के दूध में अंतर पता ही नही होता।

अब भैस के दूध की जगह जर्सी गाय का दूध पीना मतलब आसमान से गिरकर खजूर पर अटकने जैसा है। क्योंकि जर्सी गाय के दूध से तो कई गुना बेहतर तो भैस का ही दूध होता है। जर्सी गाय का दूध रोगप्रतिरोधक शक्ति को कम करके स्वप्रतिरक्षित व्याधियों (Autoimmune diseases) को उत्पन्न करता है। दीर्घकाल तक जर्सी गाय का दूध सेवन करने से पैंक्रियास को हानि पहुंचकर मधुमेह उत्पन्न होता है। इसलिये पिछले कई वर्षों से हम लोग देख रहे है कि भारत मे मधुमेह के वृद्धि का प्रमाण बेहताशा बढ़ता ही जा रहा है, जो स्वातंत्र्यपूर्व काल मे नही के बराबर था। इसके सिवा हृदयरोग, दूध का न पचना (Lactose intolerance), ऑटिज़्म और उन्माद जैसे मानस विकार भी जर्सी गाय के दूध की वजह से हो सकते है। जर्सी गाय के दूध के सेवन से इतने रोग हो सकते है ऐसा बतानेवाले शोधपत्र प्रकाशित होने बाद तो देसी गाय के दूध की बहोत मांग बढ़ी।

देसी गाय का दूध गाँव मे तो सुलभ होता है परंतु शहरों में मिलना बहोत दुष्कर होता है। फिर भी गाय के दूध का महात्म्य सुनने के बाद नये नये बने माता-पिता किसी भी हालत में अपने बच्चों को गाय का ही दूध पिलाना चाहते है। इसलिये वो नजदीकी डेरी पर मिलनेवाला गाय का दूध लेकर आते है, बिना यह जाने की लाया हुआ दूध जर्सी गाय का है या देसी गाय का। आज तो अधिकतर यह दूध जर्सी गाय का ही होता है या फिर एक ही बर्तन में रखा हुआ जर्सी और देसी गाय के दूध का मिश्रण होता है। क्योंकि डेरी में तो फैट के आधार पर दूध का वर्गीकरण होता है। वो जर्सी गाय का है या देसी गाय का इससे उन्हें कोई लेनादेना नही होता। स्वास्थ्यलाभ की दृष्टि से देसी या जर्सी गाय के दूध की समझ अभी भी डेरी में काम करनेवाले लोगो मे देखी नहीं गयी है। ऐसा दूध पीने के बाद धीरे धीरे बच्चों की रोगप्रतिरोधक क्षमता को घटाकर उनमें नये नये रोगों का प्रादुर्भाव कर देता है। फिर माता-पिता जब अपने बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाते है तो डॉक्टर इसे लैक्टोस इन्टॉलरेंस का नाम देकर गाय के दूध को दोषी ठहराते हुये बंद करवा देते है और फिर से एक बार देसी 'गाय' का दूध आरोपी के पिंजड़े में खड़ा हो जाता है, बिना यह जाने की वस्तुरूप में जो दूध सेवन किया गया वो असली गाय का न होकर, गाय जैसे दिखनेवाले एक संकरित प्राणी जर्सी का है।

देसी गाय के दूध के स्वास्थ्यलाभो से अभिभूत होकर बाजार में कई कंपनियों ने आज देसी गाय का A2 दूध बाजार में लाया है। एक देसी कंपनी ने, की जिन्होंने ही जर्सी गाय के दूध से भारतवर्ष में 'श्वेतक्रांति' लाई थी, देसी गाय का A2 दूध बाजार में बढ़े चढ़े भाव मे लाया है। फिर भी ऐसा पाश्चराइज्ड दूध गुणों में ताजे दूध से कोसो मील दूर होता है।
दूसरी बात आयुर्वेद यह भी कहता है कि दूध उसी गाय का श्रेष्ठ रहता है जो रोज चरने के लिए दिनभर घूमती हो। पूरे दिन तबेले में बैठकर चारा खानेवाली गाय का दूध गुणों में अच्छा नही होता और आज बाजार में जो देसी गाय का दूध मिलता है वो ऐसा ही होता है। क्योंकि उसका उत्पादन ही व्यापार के लिए किया जाता है। इसलिये व्यापारी स्तर पर बेचा जानेवाला देसी गाय का पाश्चाराइज्ड दूध सेवन न करे। यह स्वास्थ्यलाभ की दृष्टि से शून्य होता है।

वर्तमान में यह कलियुग का ही प्रभाव है कि जिस भूमि पर गाय को माता माना जाता है वहा गाय का दूध खरीदते समय भी सावधानी बरतनी पड़ती है। जो दूध आप खरीद रहे हो, वो सच मे देसी गाय का है या जर्सी गाय का। ताजा है या पाश्चाराइज़ेड यह परखना पड़ता है। इससे अधिक सांस्कृतिक अधोगति और क्या हो सकती है?
एक और बात आज हम देखते है कि देसी गाय के नसीब में तो चारा भी नही है। देसी गाय आज की स्थिती में चारा नही मिलने की वजह से कूड़ेदान में पड़ा कचरा और पेपर खाती रहती है। ऐसी देसी गाय का दूध पीकर भी कोई फायदा नही। इसलिये दिन भर घूमकर चरनेवाली गाय का ताजा दूध पीना चाहिए। जो गुणों में श्रेष्ठ होता है। गाय का दूध पीने से मन सात्विक बनता है। शरीर सदैव उत्साही रहता है। 

देसी गाय के दूध की यह वास्तविकता जानना, समझना इसलिये आवश्यक है क्योंकि उसीके नाम से आज बाजार में जहर बेचा जा रहा है। लोगो को देसी के नाम से जर्सी गाय का दूध देकर फसाया जा रहा है। इसलिये सतर्क रहें, सावधान रहें और देसी गाय के दूध का ही आग्रह रखे। जर्सी गाय का दूध अमंगल एवं व्याधिकारक है। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत