Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 21 Mar 2019 Views : 282
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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खट्टा खाये तो क्या खाये?

अधिकांश रुग्ण जब आयुर्वेदिक औषधि लेने आते है, तब एक ही तक्रार करते है कि प्रत्येक वैद्य औषधि सेवन के दरम्यान खट्टा खाने की मनाई करते है। ऐसा क्यों?

तो इसके लिए हमे खट्टा स्वाद मतलब क्या और उसके कार्य क्या है उसे समझना पड़ेगा।

खट्टा स्वाद मतलब आयुर्वेदिक परिभाषा में अम्ल रस। आयुर्वेद के अनुसार आहार षडरसात्मक होना चाहिए अर्थात आहार सेवन करते वक्त आपके थाली में 6 स्वाद वाले खाद्यपदार्थ होना चाहिये। शरीर के क्रियाकलाप प्राकृतिक पद्धति से चले इसके लिए आहार में इन 6 रसों की आवश्यकता होती है। इसमे अम्ल रस मतलब खट्टा स्वाद यह भोजन को पचाने में सहायता करता है। अन्न पचनकाल में जो आर्द्रता की आवश्यकता होती है उसे अम्ल रस पूरा करता है। इसलिये भोजन में अत्यल्प प्रमाण में ही क्यो न हो, पर अम्ल रस होना चाहिये। अम्ल रस के इन गुणधर्मों के सिवा अन्य गुणधर्म यह है कि - यह आहार सेवन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है मतलब खाना अगर खट्टा है तो हम तुरंत खा लेते है। यह मन को प्रसन्न कर देता है इसलिये लोग इसे प्रमाण में खाने की बजाय इसका अतिमात्रा में सेवन करते रहते है। अम्ल रस के इस गुणधर्म की वजह से ही आज बाजार में जितने बने-बनाये तैयार मसाले मिलते है, उनमें अमचूर अनिवार्य रूप से डाला ही जाता है। क्योंकि बिना अमचूर या अन्य अम्ल रसात्मक आहारवस्तु के भोजन पदार्थों में स्वाद आता ही नही।

परंतु मनुष्य को जो अच्छा लगता है उसे वो प्रमाण में खाये तो वह मनुष्य ही नही। वह उसे अतिमात्रा में खाना शुरू कर देता है। फिर दाल में भी निम्बू, टमाटर होता है। ऊपर से सब्जी के मसाले में भी अमचूर होता है। साथ मे अचार, दही, छाछ या कढ़ी होती ही है। इतना अम्ल रस क्या कम होता है तो लोग पीनेवाले पानी मे भी निम्बू निचोडकर ही पीते है।
अम्ल रस की यह अति शरीर धातुओं में शिथिलता उत्पन्न कर देती है। शिथिलता मतलब उन उन शरीर धातुओं का जो प्राकृतिक सौष्ठव है उसे नष्ट कर देता है। प्राकृतिक सौष्ठव नष्ट होने का परिणाम यह होता है कि वह धातु व्याधिप्रवण बन जाता है और धीमे धीमे उसमे व्याधिघटको का प्रवेश होकर व्याधि उत्पन्न हो जाता है। अगर पहले से व्याधि है तो अल्प मात्रा में भी अम्ल रस सेवन उस व्याधि को बढ़ावा देता है। इसलिये आयुर्वेद पथ्याहार में अम्ल रस सेवन को निषिद्ध मानता है।

परंतु अब स्थिती ऐसी होती है कि जो लोग खट्टा खाने के आदि होते है, उनका खट्टा खाना अगर बंद कर दिया जाता है, तो वो अपना खाना ही कम कर देते है। परिणामस्वरूप शरीर मे दुर्बलता आती है और जिस व्याधि की चिकित्सा चालू है वह व्याधि इस दुर्बलता की वजह से कम होने बजाय बढ़ता है।

मनुष्य मन की इस विकृति का आयुर्वेद के आचार्योंने पहले ही अभ्यास करके रखा था। इसलिये उन्होंने इस अम्ल रस में सेवन के लिए ऐसे पर्याय बताये है, जो स्वाद में खट्टे होकर भी विकृतिजनक नही है। जैसे आँवला और दाड़िम (अनार)। यह दोनो फल स्वाद में खट्टे होते है। तो पथ्य आहार सेवन करते वक्त जहां जहां खट्टा खाने की इच्छा हो, वहां पर दाड़िम या आंवले का उपयोग करना चाहिये। फिर चाहे दाल में डालना हो या सब्जी में, भेल में डालना हो चटनी में। इन दोनों का प्रचुर मात्रा में बिना संकोच उपयोग किया जा सकता है। इन दोनों फलों की खटाई किसी भी रूप में शरीर को हानिकारक नही होती। मधुमेह तथा किडनी फेल्योर जैसे रोगों में भी इन दो फलो का स्वादपुर्ती के लिए उपयोग किया जा सकता है।

इसके सिवा काले मुनक्कों का भी उपयोग खट्टे स्वाद के लिए किया जा सकता है। भोजन करते समय प्रत्येक निवाले के साथ एक-दो मुनक्के खाना चाहिये। जिससे खट्टा खाने का आनंद भी मिलेगा और परहेज भी नही टूटेगा। परंतु मुनक्के डायबिटीज और किडनी फेल्योर वाले रुग्ण नही खा सकते, यह ध्यान रहे।

बाजार में गीली सफेद हल्दी भी कभी कभार मिल जाती है। उसका भी स्वाद खट्टा होता है। इसलिये गीली सफेद हल्दी का भी उपयोग खट्टे स्वाद की आपूर्ति के लिए किया जा सकता है।

कढ़ी पत्ता भी एक ऐसा ही मसाला द्रव्य है, जो अल्प प्रमाण में ही क्यो न हो पर स्वाद में थोड़ा खट्टा है। कढ़ी पत्ता सुखाकर इसकी पाउडर बनाकर रखे। इस पावडर का उपयोग भात में मिक्स करके खाने के लिए अथवा सब्जी के बघार में ही डालने के लिए किया जाता है। इससे भी सब्जी में पर्याप्त मात्रा में अम्लत्व उत्पन्न होता है। यह अम्लत्व शरीर के लिए हानिकारक नही होता।

फालसा के ताजे पके फलों का भी उपयोग खट्टे स्वाद की उपलब्धी के लिए किया जा सकता है। भोजन करते समय प्रत्येक निवाले के साथ फालसा का एक एक ताजा फल खाया जा सकता है। फालसा के फल की तो विशेषता है कि यह किडनी फेल्योर के रुग्ण भी बिना संकोच सेवन कर सकते है। फालसा के फलों में पोटैशियम का प्रमाण अल्प मात्रा में होता है, इसलिये वृक्कदौर्बल्य वाला रुग्ण इसे सेवन कर सकता है।

उपरोक्त खट्टे स्वाद वाले आहारद्रव्यों का उपयोग कर भोजन को निश्चित ही मुखप्रिय बनाया जा सकता है। इन खट्टे द्रव्यों से मन भी प्रसन्न रहता है और शरीर भी तंदुरुस्त रहता है। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत