Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 18 Apr 2019 Views : 216
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
18 Apr 2019 Views : 216

सोयाबीन - उपयोगी या हानिकारक?

सोयाबीन यह दलहन की फसल है मतलब जिससे दाल बनती है। यह मूलतः भारतीय फसल नही है। फिर भी पाश्चात्यों द्वारा किये गये संशोधन से प्रभावित होकर आज बहोत अधिक मात्रा में सोयाबीन भारत मे उगाया एवं खाया जाता है।

पाश्च्यात्य विज्ञान किसी भी आहार पदार्थ को उसमे उपस्थित प्रोटीन, फैट या कार्बोहाइड्रेट की मात्रा के अनुसार महत्व देता है वही आयुर्वेद सभी आहारद्रव्यों का उनका पांचभौतिक संगठन और शरीर धातुओं पर उनके होनेवाले परिणामो के अनुसार आंकलन करता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार सोयाबीन में 44% प्रोटीन होते है। इसलिये पाश्च्यात्य लोग खाने में सोयाबीन से बने हर तरह के व्यंजन खाते है। परंतु ध्यान रहे वस्तुतः सोयाबीन यह पशु खाद्य है, न कि मनुष्य का आहार। उसमे भी यह उन पशुओं के लिए ही अच्छा है, जो पाश्च्यात्य देशों जैसे शीतप्रदेशों में रहते है तथा दिनभर चरने के लिए घूमते रहते है। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के पशुओं के लिए यह उपकारक नही है। अतएव ऐसे पशुओं के आहार में भी सोयाबीन का अंतर्भाव करना ठीक नही होता।

मनुष्यों में सोयाबीन जल्दी पचता नही। इसे पचने में बहोत देर लगती है। इतनी देर की तब तक पाचनसंस्था का टाइम आउट हो जाता है। मतलब पाचन तंत्र थक जाता है। इसलिये सोयाबीन अगर रोज रोज खाया जाये तो पाचनतंत्र दुर्बल हो जाता है और वो अन्य आहारवस्तुओ को भी ठीक तरफ से पचा नही पाता। इसकी वजह से एक और दुष्परिणाम देखने को मिलता है कि रोजाना सोयाबीन खानेवाले व्यक्तियों को बहोत ज्यादा गैसेस होते है। पेट एकदम भारी भारी लगना शुरू हो जाता है और कुछ दिनों के बाद तो उस व्यक्ति के अपानवायु का भी भयंकर दुर्गंध आने लगता है।

पाचन पूरा न होने के कारण सोयाबीन से कुछ अधपके रसायन (Intermediary products) तैयार हो जाते है। यह अधपके रसायन शरीर के लिए सात्म्य (assimilable) नही होते। इसलिये शरीर इन रसायनों के विरुद्ध एक विशिष्ट प्रतिक्रिया (Reaction) दर्शाता है, जो व्याधिस्वरूप में प्रकट होती है। आज की भाषा मे इस प्रतिक्रिया को हम एलर्जी (Allergy) के नाम से जानते है। इसलिये तो आज बाजार के जिन जिन उत्पादों में सोयाबीन होता है उन सबपर सोया प्रोटीन्स से एलर्जी उत्पन्न हो सकती है ऐसी वैधानिक सूचना लिखी हुई रहती है।

सोयाबीन में फायटिक एसिड नाम से एक रसायन होता है। यह रसायन आहार में उपस्थित लौह, कैल्शियम, मैग्नेशियम, जिंक जैसे खनिजों के साथ चिपक जाता है। परिणामस्वरूप इन खनिजों का रक्त में शोषण नही होता। इसलिये रोजाना सोयाबीन सेवन करनेवाले सज्जनों में इन खनिजों की न्यूनता पाई जाती है। इसके सिवा सोयाबीन में बहोत ज्यादा मात्रा में फायटोएस्ट्रोगेन्स (Phytoestrogens) पाए जाते है, इन फ़ायटोएस्ट्रोजेन्स की वजह से पुरुषों के शरीर मे टेस्टोस्टेरोन कम होकर एस्ट्रोजन की मात्रा बढ़ने लगती है, परिणामतः पुरुष के मैथुनसामर्थ्य तथा मैथुनेच्छा में कमी आ जाती है। फ़ायटोएस्ट्रोजेन्स के उपस्थिति की वजह से महिलाओं में रजोनिवृत्ति काल मे इसका उपयोग आशीर्वाद के समान हो सकता था, परन्तु यह पाचन में इतना गरिष्ठ है कि जल्दी पचता नही। फलस्वरूप इसके फ़ायटोएस्ट्रोजेन्स भी शरीर को उपलब्ध नही हो पाते। ऊपर से पाचनतंत्र को थका देता है वो अलग बात है। मतलब फायदा तो मिलता नही, ऊपर से नुकसान ही दुगुना।

सोयाबीन की एक और नकारात्मक विशेषता यह है कि इसकी फसलपर रासायनिक जंतुनाशकों का जो छिड़काव किया जाता है, उसे सोयाबीन अधिक मात्रा में शोषित कर लेती है। इसलिये सोयाबीन सेवन करनेवाले लोगो में इससे संबंधित केंसर होने की संभावना रहती है।

सोयाबीन दलहन के साथ साथ तिलहन की भी फसल है। इसमे से तेल भी निकाला जाता है। वर्तमान काल मे यह तेल आहार में बहोत ज्यादा मात्रा में प्रयुक्त किया जाता है। परंतु दलहन के रूप में जो वस्तु उपयोग के योग्य नही, वो तिलहन के रूप में कैसे योग्य हो सकती है? तेल के बारे में भी यही बात है कि सोयाबीन का तेल यह आहार में प्रयोग के जरा भी लायक नही है। सोयाबीन का तेल गुणों में अत्यंत चिपचिपा (स्त्यान) होता है। यह चिपचिपापन उसे पाचन में भयंकर गरिष्ठ (Heavy to digeat) तथा विदाही बना देता है। परिणामस्वरूप पाचकाग्नि दुर्बल होकर अवांछनीय अधपके रसायन तैयार हो जाते है। 

सोयाबीन के तेल का यह गुणधर्म शरीर धातुओ की कार्यक्षमता को न्यून कर देता है। हृदय की कार्यक्षमता में भी यह उपयोगी नही है। आधुनिक विज्ञान भले कहे कि यह कोलेस्ट्रॉल कम करता है परंतु हृदय के कार्य मे यह निश्चित रूप से बाधा उत्पन्न करता है। इसके साथ साथ सोयाबीन का सेवन शरीर मे बेवजह सूजन (inflammation) भी उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। इसलिये जिन व्याधियों में पहले से ही सूजन है ऐसे व्याधियों में तो इसका सेवन बंद करना ही अच्छा होता है।

सोयाबीन के उपरोक्त गुणधर्म देखने के बाद आपको पता चलेगा कि यह मुख्यतः पशुखाद्य है और मनुष्यों के लिए भी उपयोगी से ज्यादा हानिकारक ही है। इसलिये इसके सेवन से दूर रहने में ही समझदारी होती है। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत