Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 07 Mar 2019 Views : 170
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
07 Mar 2019 Views : 170

खाने के बाद दिन में सोना

आयुर्वेद में भोजन के बाद वामकुक्षी करने की सलाह दी है। मतलब खाने के बाद कुछ देर तक बायी करवट पर सोना चाहिये। यहां सोने का अर्थ है सिर्फ उस आसन (Left lateral position) में लेटे रहना है। आँख बंद करके गहरी नींद सोना यहां अपेक्षित नही है।
भोजनोत्तर बायी करवट पर सोने से जठर में उपस्थित पूर्ण अन्न जठर के बायी तरफ अर्थात नीचे आ जाता है और ऊपर की ओर अर्थात दायी तरफ खाली जगह बन जाती है, जहां जठर में स्थित हवा जगह बना लेती है। यह हवा की मात्रा अगर जरूरत से ज्यादा हो तो ऊपर आयी हुई यह हवा तुरंत अन्ननलिका के द्वारा मुख से बाहर डकार के रूप में निकल जाती है। ऐसा करने से पाचन सुखपूर्वक होता है। अन्यथा जठर (Stomach) में हवा की अतिमात्रा में उपस्थिती पाचन की प्रक्रिया में खलल डालती है।
कहते है साथ मे मिलकर खाने से प्यार बढ़ता है। आपसी संबंध मजबूत बनते है। इसलिये आजकल ऑफिस हो या घर सभी लोग साथ मे बैठकर खाना खाते है। अब साथ मे बैठेंगे तो देश-दुनिया की बाते भी होगी, हंसी के ठहाके भी लगेंगे। पर आयुर्वेद तो कहता है कि एकांत में बैठकर ही भोजन लेना चाहिए, न कि सबके साथ। इसका कारण यह है कि सबके साथ बैठकर जो बातें होती है, उन बातों की वजह से अनावश्यक मात्रा में अन्न के साथ हवा का भी निगलन (Ingestion) होता है। अनावश्यक मात्रा में जठर में पहुंची यह हवा पाचन की प्रक्रिया में विलंब उत्पन्न करती है। इसलिये इसे जठर से बाहर निकालना आवश्यक होता है। भोजन के बाद बायी करवट पर सोने का उद्देश्य इसी अनावश्यक मात्रा में संचित हवा को जठर से बाहर निकालना होता है। इसलिये आयुर्वेद भोजनोत्तर तुरंत वामकुक्षी करने की सलाह देता है। परंतु लोगो ने इस सूत्र का विपर्यास कर उससे अपने को अनुकूल ऐसा सोने के अर्थ ले लिया और दोपहर में सोना शुरू कर दिया।
नोकरी या व्यवसाय में माध्यान्हकाल मे भोजनोत्तर विश्रान्तिकाल की आवश्यकता तो होती है। परंतु यह आवश्यकता सुखपूर्वक पाचन हो इसलिये होती है और विश्रान्तिकाल मतलब मेरुदंड सीधा करके सुखपूर्वक बैठना होता है। न कि गहरी नींद लेना।
कुछ कुछ कॉर्पोरेट कंपनियों में तो कर्मचारियों को 'पावर नैप' लेने की रितसर अनुमति प्रदान की गयी है। बहोत मेहनतवाला काम हो तो ऐसे कामो में अल्पकालीन विश्रांति की निश्चित आवश्यकता होती है। परंतु जरूरी नही की यह विश्रांति भोजनोत्तर तुरंत ही लेनी चाहिये। यह कमसे कम 10-15 मिनट के लिए कभी भी ली जा सकती है।
आयुर्वेदोक्त वामकुक्षी यह केवल भोजन के बाद 100 कदम चलने के बाद ही लेनी चाहिये। वामकुक्षी का भी समय अधिक से अधिक 15 मिनट ही होना चाहिए। वामकुक्षी के बाद 30 मिनट तक सीधा (राजा जैसा, जिसमे मेरुदंड एकदम बम्बू जैसा सीधा हो) बैठना चाहिये और इसके पश्चात ही अपने काम मे संलग्न हो जाना चाहिये। भोजन के बाद इस 45 मिनट के दरम्यान कोई भी मेहनतवाला काम नही करना चाहिये। बैठे बैठे कोई भी काम किया जा सकता है, जैसे कोई कंप्यूटरवाला काम हो या अन्य टेबल वर्क।
जो लोग भोजन के बाद गहरी नींद में सो जाते है, धीरे धीरे उन लोगो के शरीर का मांस धातु (Muscle tissue) दूषित होना शुरू हो जाता है और जाठराग्नि दूषित होकर पाचनक्रिया मंद हो जाती है। परिणामस्वरूप उससे संबंधित व्याधि, जैसे तरह तरह के त्वचारोग, सुबह सुबह बहोत छींके आना (Allergy), पूरा शरीर भारी भारी सा लगना, आमवात, कृमि इत्यादि उत्पन्न होना शुरू हो जाते है।
कुछ लोगों की नाईट ड्यूटी रहती है। जिसमे पूरी रात भर जागकर काम करना होता है। ऐसे लोग दोपहर में सो सकते है। परंतु वो भी खाली पेट। नाईट ड्यूटी से आकर नहाधोकर ही खाली पेट सो जाना चाहिए। बहोत भूख लगी हो तो थोड़ा गरम दूध अथवा फलस्वरस पीकर सो सकते है। परंतु नाईट ड्यूटी से आकर भरपेट खाना खाकर तुरंत सो जाना अनेक रोगों को आमंत्रित करनेवाला होता है। अथवा नाईट ड्यूटी से आकर नहाधोकर सीधा भोजन ही कर ले। इसके बाद 3 घंटो तक जो काम निपटाने है वो पूर्ण कर ले और 3 घण्टे के बाद एकबार सोये की सीधा शाम को उठकर पुनः भोजन करके काम पर जाये। पर किसी भी परिस्थिती में भोजन ग्रहण करने के बाद तुरंत न सोये। अस्तु। शुभम भवतु।
© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत