Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 21 Feb 2019 Views : 995
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
21 Feb 2019 Views : 995

मधुमेह और मेथी, करेला, जामुन के बीज

मधुमेह अर्थात डायबिटीज। यह आधुनिक जीवनशैली का प्रसाद है। जैसे जैसे जीवन व्यस्त होता गया, वैसे वैसे जीवनशैली मे भी बदलाव आते गये। इन बदलावो के साथ मानसिक तनाव भी आया, जो कई शारीरिक तथा मानसिक विकारों का प्रत्यक्ष कारण भी बना। इस दोगुने आघात के कारण स्वातंत्र्योत्तर काल मे भारतवर्ष मे मधुमेह अत्याधिक प्रमाण मे बढा। आज भारत के 100 में से 7-8 लोग मधुमेह से पीड़ित है। इतनी ज्यादा मात्रा मे लोगो के पीड़ित होने के कारण बाजार मे मधुमेह हर औषधियों की माँग भी बढी और आज बढती ही जा रही है। प्रत्येक कंपनी अपने औषधियों मे एक तो मधुमेहहर औषधि का निर्माण करती ही है। अब जो औषधि शीघ्र परिणाम दिखाएगी, वही औषधि बाजार मे अपना अस्तित्व बनाए रख सकती है। अन्यथा लोग देर से परिणाम करने वाली औषधि को पसंद नही करते और आयुर्वेद मे प्राचीन काल से वर्णित जितनी मधुमेहहर औषधियाँ है, वह सभी मंदगती से अपना परिणाम दर्शाती है। सुबह औषधिसेवन किया और शाम तक रक्तशर्करा का नियमन हुआ ऐसी औषधि आयुर्वेद मे नही है। आयुर्वेद की औषधियाँ रोग की जडो पर प्रहार करके ही रक्तशर्करा का नियमन करती है। इसलिये बाजार को ऐसी कुछ औषधियो की आवश्यकता थी, जो शीघ्र ही रक्तशर्करा का नियमन करे और पैथोलोजी रिपोर्ट्स सामान्य आये।

आधुनिक विज्ञान (Pharmacology) ने मेथी, जामुन के बीज और करेला जैसे द्रव्यों पर शोध करके यह सिद्ध किया कि इन तीनों द्रव्यों का अलग अलग सेवन रक्तशर्करा को कम करता है। हाँलाकि इन तीनों द्रव्यों का आयुर्वेद मे उल्लेख है। आयुर्वेद मे मधुमेह का सविस्तर वर्णन चिकित्सा भी वर्णित है। परंतु न मधुमेह की चिकित्सा मे इन तीन द्रव्यों का उल्लेख है, न ही इन तीनो द्रव्यो के व्याधिनिर्देशों मे मधुमेह का। मतलब आयुर्वेद को मधुमेह की चिकित्सा मे इन तीन द्रव्यों का उपयोग अपेक्षित नही है। परंतु आज का चित्र यह है बाजार मे उपलब्ध प्रत्येक मधुमेहहर औषधयोगों मे तीनों की उपस्थिती अनिवार्य होती ही है। उपर से इन औषधियोगों पर 'आयुर्वेदिक औषधी' ऐसा लिखा भी होता है। पता नही किन आयर्वेदीक ग्रंथो मे इन तीन द्रव्यों को मधुमेह के लिए उपयोगी बताया है?

मेथी, जामुन के बीज तथा करेला मधुमेह के लिए बस चमत्कार का काम करते है। रोगी का यह औषधि शुरू करते से ही रक्तशर्करा कम होना शुरू हो जाती है और 2-3 सप्ताह मे रक्तशर्करा एकदम सामान्य हो जाती है। रोगी इन परिणामों से उत्साहित होकर 2 बार लेनेवाली औषधि 3 बार लेना शुरू कर देता है। साथ मे मेथी, करेले की सब्जी भी रोज खाना शुरू कर देता है। कुछ सज्जन तो मेथी, करेले का ज्यूस (स्वरस) भी पीना शुरू कर देते है। मतलब इनकी बनाई हुई औषधि के साथ, वही सब्जी और ज्यूस। रोगी एकदम तरोताजा अनुभव करना शुरू कर देता है। परंतु रोगी का यह आनंद ज्यादा दिन टिकता नही। क्योंकि उपरोक्त तीनो औषधियाँ पूर्णतः वातवर्धक एवं पित्तप्रकोपक है। इसलिये औषधि लेने के बाद रोगी को तुरंत सकारात्मक परिणाम मिलता है। परंतु कुछ समय के बाद (अर्थात आमपचनोत्तर) यही औषधियाँ वात और पित्त को अत्याधिक मात्रा मे बढाना शुरू कर देती है। विकृत रूप से बढा हुआ यह वात और पित्त मधुमेह की मूल प्रक्रिया को और बढावा देता है। परिणामस्वरूप जो औषधि पहले मधुमेह (DM-II) को कम कर रही थी। उसी औषधि के शुरू होने के बावजूद भी अनन्तर काल मे रक्तशर्करा बढने लगती है और बाद बाद मे पूर्णतः अनियंत्रित हो जाती है और कभी तो इन्सुलिन लेना पडता है। इससे स्पष्ट होता है की उपरोक्त तीनों औषधियाँ सदासर्वकाल नही बल्कि एक विशिष्ट काल, विशिष्ट अवस्था तक ही उपयोगी होती है। उस विशिष्ट काल के बाद यही औषधियाँ मधुमेह को बढाने मे कारण सिद्ध होती है। इसलिये प्रायः हम देखते है की मेथी, जामुन के बीज अथवा करेला सेवन करने के बाद भी रुग्ण मे मधुमेह बढता ही रहता है। अगर इन तीनो औषधियों के सेवन से सच मे मधुमेह ठीक हो जाता तो आयुर्वेद के ऋषिमुनियों को मधुमेह की चिकित्सा बताने की माथाकूट करने की कोई आवश्यकता ही नही थी। सिर्फ इन तीनो औषधियों को वो मधुमेह की चिकित्सा मे उपयोगी बता देते, मामला खतम। परंतु ऐसा नही होता। इसलिए मेथी, जामुन के बीज तथा करेला जैसे आहार द्रव्यों का मधुमेह मे उपयोग करने से पहले तज्ञ वैद्यराज की सलाह लेना उचित होता है। अन्यथा आप स्वतः ही अपने मधुमेह को बढाने के जिम्मेदार होंगे यह ध्यान रहे। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत