Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 10 Jan 2019 Views : 1401
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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त्वचारोगों जल्दी ठीक क्यों नही होते?

प्रत्येक व्यक्ति त्वचारोग अथवा अन्य कोई भी व्याधि से पीड़ित होने के बाद सबसे पहले उस रोग से कितने दिनों में छुटकारा मिलेगा यह प्रश्न करता है। मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति आयुर्वेद के आचार्यों को वर्षों पहले ही ज्ञात थी। इसलिए इस विषय पर आचार्यों ने हजारों वर्ष पूर्व की विस्तार से विवेचन कर दिया है।
त्वचारोग विविध प्रकार के होते है। एकदम छोटे से लेकर बहोत बड़े तथा कुछ आशुकारी (Acute) तो कुछ जीर्ण (Chronic) होते है। प्रत्येक त्वचारोग का अपना अलग स्वरूप एवं लक्षण होते है। उनके इस स्वरूप तथा लक्षणों के आधार पर ही उनकी साध्यासाध्यता निश्चित होती है। अब सामान्य नियम यह है कि व्याधि जितना छोटा एवम जितने कम लक्षण उतना ही जल्दी वह ठीक होगा और जितना व्याधि बड़ा, जितने लक्षण ज्यादा अथवा उग्र उतना ही अधिक समय उसे ठीक होने में लगेगा। परंतु ध्यान रहे व्याधि की साध्यासाध्यता का यह सामान्य नियम त्वचारोगो के लिए लागू नही पड़ता और जैसा कि ऊपर निर्देश किया ही है कि इस बात की स्पष्टता आचार्यों ने पहले ही कर दी है।
आयुर्वेद के अनुसार त्वचारोग अत्यंत छोटा हो या बहोत बड़ा, वह ठीक तभी होता है, जब रोगी 'जितेंद्रिय' हो। जितेंद्रिय अर्थात जिसने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त किया हो मतलब जो व्यक्ति अचूक, बिना भूले परहेज का पालन करता हो, उसका ही त्वचारोग साध्य होता है। अन्यथा वह रुग्ण कितनी भी चिकित्सा ले, तो भी दाद (Fungal infection) अथवा खाज (Eczema) जैसे अत्यंत साधारण त्वचारोग भी ठीक नही होता। फिर बड़े बड़े त्वचारोगों की तो बात ही कहां और आजकल यही बात मुख्य समस्या बनी हुई है। लोगों को इतना जिह्वालौल्य (खाने की लालसा) होता है कि चिकित्सा के दरम्यान लाख मना करने के बावजूद भी लोग अपथ्य सेवन कर ही लेते है। खाने की लालसा स्वयं रुग्ण को होती है। परंतु वह आप्तस्वकीयों (Relatives) के आग्रह का आदर रखने के लिए थोड़ा ही खाया ऐसी दलील देता है। ऐसी दलील कुछ व्यावसायिक कारणों से वैद्यराज भले ही स्वीकार कर ले, परंतु शरीर इसे किंचित भी स्वीकार नही करता। फिर ऐसे अपथ्य सेवन के उपरांत औषधियों के सेवन से अस्थायी रूप से स्थगित व्याधिप्रक्रिया (Pathogenesis) पुनः शुरू हो जाती है और शरीर पर पुनः सभी लक्षणों की उत्पत्ति हो जाती है। पुनः उत्पन्न इन लक्षणों की वजह से व्याधिप्रक्रिया पहले से ज्यादा बलवान बनकर उभरती है, जो व्याधि को और कष्टसाध्य या असाध्य बना देती है। इसलिए ही आयुर्वेद के ऋषि-मुनियों ने यह बात सहस्रों वर्ष पूर्व ही स्पष्ट कर दी है की त्वचारोग छोटा हो या बड़ा, नवीन हो या जीर्ण, ठीक उसी व्यक्ति का होगा, जो जितेंद्रिय होगा। अन्यथा त्वचारोगों से छुटकारा पाना मतलब एक स्वप्न ही है।
आयुर्वेद का इसी संदर्भ में एक अन्य दृष्टिकोण भी है। आयुर्वेद के अनुसार कोई भी त्वचारोग बिना 'बहुदोष' के होता नही। बहुदोष अर्थात ऐसी स्थिती जिसमे व्याधि उत्पन्न करनेवाले घटकों (factors) की ताकत बहोत अधिक रहती है। इसका दूसरा अर्थ यह है की व्याधि उत्पन्न करनेवाले घटक अगर दुर्बल (Weak) रहे तो त्वचारोग निर्माण ही नही होते। त्वचारोगों की उत्पत्ति के लिए वात, पित्त, कफ जैसे शरीरदोषों का प्रभूत मात्रा में दूषित होना अत्यावश्यक होता है। इसलिए व्यवहार में भी हम देखते है कि केवल एकबार फ़ास्ट फ़ूड या फ्रूट सलाड (मतलब आयुर्वेद के अनुसार विरुद्धाहार) खाने से किसी को आजतक त्वचारोग नही हुआ। तो त्वचारोगों की उत्पत्ति के लिए फ्रूट सलाड या फ़ास्ट फूड सतत और नियमित खाना पड़ेगा अथवा ऐसे अनेक कारणों का एकसाथ अधिक मात्रा में सेवन करना पड़ेगा, तब जाकर त्वचारोग का निर्माण शुरू होगा। जैसे बिना पाप का घड़ा भरे किसी भी व्यक्ति को दंड (Punishment) नही मिलता। बस वैसे ही जब तक अहितकर आहारविहार के सेवन की अति होकर शरीरदोष और धातुओं (Body tissues) की प्रभूत मात्रा में विकृति नही होगी तब तक त्वचारोग उत्पन्न नही होते। इस ' बहुदोषता' के कारण ही आयुर्वेद के आचार्योंने त्वचारोगों में हर 15 दिनों में एक बार वमन (Medically induced emesis), हर महीने में एक बार विरेचन (Purgation), हर तीन तीन दिन में एक बार तीक्ष्ण नस्य (Medicated Nasal Drops) और हर 6 महीने में एक बार रक्तमोक्षण (Blood letting) करना चाहिए ऐसा कहां है। यहां जो वमन, विरेचन, नस्य और रक्तमोक्षण शब्द आये है यह सभी शरीरशोधन के लिए की जानेवाली पंचकर्म की प्रक्रियाएं है। मतलब इस बहुदोषता के कारण ही इतने युद्धस्तर (War footing basis) पर चिकित्सा की आवश्यकता होती है।
अब यह जो युद्धस्तरीय चिकित्सा प्रकार आयुर्वेद के आचार्योंने ने बताया है, क्या यह आज आर्थिकदृष्टि से एक रुग्ण द्वारा करवा पाना संभव है? क्या कॉरपोरेट सेक्टर के इस युग मे इतना समय एक रुग्ण दे सकता है? इन दोनों प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर है - नही।
तो जब रुग्ण जितेंद्रिय भी नही रह सकता और इस तरह की युद्धस्तर की चिकित्सा भी नही कर सकता तो क्या रुग्ण का त्वचारोग पूर्णरूपेण ठीक हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर भी नही ही है।
त्वचारोग ठीक न होने का एक और कारण है जिसे केवल आयुर्वेद ही मानता है और वह है मनुष्य का पापकर्म। त्वचारोग उत्पन्न होने के लिए आयुर्वेद ने पापकर्म को एक कारण माना है। जब पापकर्मों का अतिरेक होता है तो उसके कर्मविपाक स्वरूप में उस व्यक्ति में त्वचारोगो की उत्पत्ति होती है। इन सभी पापकर्मों का भोगकर जबतक क्षय नही होता, तब तक उससे उत्पन्न रोग का भी ह्रास नही होता और यह हिसाब किताब मनुष्य की समझ से परे होता है। इसलिए पापकर्म की वजह से अगर किसी व्यक्ति को त्वचारोग हुआ है तो वह कब ठीक होगा इसके बारे में अनुमान लगाना संभव नही होता।
त्वचारोग ठीक न होने का एक और मुख्य कारण, वर्तमान काल मे पाया जाता है। आजकल 99 प्रतिशत भारतीय लोग साबुन से नहाते है और हम जानते है कि कोई भी साबुन बिना डिटर्जेंट के नही बनता। साबुन के सतत और अत्याधिक उपयोग से यह डिटर्जेंट, त्वचा की व्याधिक्षमता कम करके उसे विविध व्याधियों के लिए प्रोन बनाता है। त्वचारोगो का आजकल जो प्रमाण बढ़ा हुआ है उसका यह भी एक कारण है। अब विरोधाभास ऐसा की इन त्वचारोगो की चिकित्सा में आजकल फिर से मेडिकेटेड साबुनों (Medicated Soaps) का ही उपयोग किया जाता है। साबुन चाहे सादा हो या मेडिकेटेड उसमे डिटर्जेंट तो होता ही है। इसलिए त्वचारोगो की चिकित्सा में मेडिकेटेड साबुनों का उपयोग करना मतलब जिससे आग लगी है उसीसे आग बुझाने का प्रयत्न करने की मूर्खता करने जैसा होता है। डिटर्जेंट के रूप में इस तरह से कारणों का सतत संपर्क त्वचारोगो को जल्दी ठीक होने ही नही देता।
उपरोक्त स्पष्टीकरण पढ़कर एक बात आपके ध्यान में आई होगी कि त्वचारोग जल्दी होते भी नही और हुए तो जल्दी ठीक होते ही नही। त्वचारोगो को ठीक करने के लिए चिकित्सारूपी तपस्या की ही आवश्यकता होती है। यह कोई एक दो दिनों का काम नही।
अस्तु। शुभम भवतु।
© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत