Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 27 Dec 2018 Views : 651
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त्वचारोग आहारविहार मार्गदर्शन - भाग 2

अपथ्याहार
अपथ्य अर्थात जो पथ्य नही है, मतलब जो उस व्याधी को बढ़ाता है।
1) त्वचारोग से पीड़ित व्यक्ति को मांसाहार नही करना चाहिए। आचार्यो ने वैसे तो त्वचारोगों की चिकित्सा में कुछ विशिष्ट प्राणियों का मांस खाने की सलाह दी है। परंतु उस व्याधि की एक विशिष्ट अवस्था मे। अतःएव त्वचारोगों में वैद्यराज की सलाह विना मांसाहार नही करना चाहिए, अन्यथा वह व्याधी ठीक होने की जगह पुनः उत्पन्न हो सकता है।
2) आयुर्वेद मे त्वचारोगियों के लिए दूध का भी निषेध बताया है। परंतु यहाँ एक व्यावहारिक समस्या है। रुग्ण अगर धनिक है तो उसका दूध बंद किया जा सकता है। क्योंकि दूध बंद करने से उसके पोषण स्तर में कोई फर्क नही पड़नेवाला। परंतु रुग्ण अगर गरीब है और उसमे भी अत्यंत कृश है और तो उसका दूध बंद करना उचित नही होता। क्योंकि उसके सर्वांगीण पोषण का यही एक रास्ता होता है। इसलिए ऐसी स्थिती मे रुग्ण को हल्दी मिला हुआ हल्का गरम दूध सेवन करने की छूट दी जा सकता है। अन्यथा रुग्ण मे दौर्बल्य उत्पन्न होने की प्रबल संभावना रहती है। दूध मे स्वाद के लिए इलायची मिश्रित की जा सकती है। परंतु कोको पावडर से बने तथाकथित एनर्जी ड्रिंक्स पावडर को दूध मे नही मिलना चाहिए। दूध के साथ साथ दही, छाछ, चीज, पनीर, श्रीखंड ये पदार्थ भी वर्ज्य करना चाहिए। क्योंकि इनका सेवन त्वचारोगों मे स्त्राव, खुजली तथा सूजन बढाने मे सहायक होता है।
3) दालों मे कुलथी, उडद और वाल का निषेध किया है। क्योंकि यह तीनो रक्त को दूषित करते है और व्याधी प्रक्रिया को बढाते है।
4) गन्ना चूसना अथवा उनका रस कफवृद्धि करनेवाले होने के कारण आचार्यों ने इसका सेवन भी निषिद्ध बताया है।
5) किसी भी धान्य को पीसकर बनाए हुए आँटे से बनी आहार वस्तुओं का भी सेवन त्वचारोगों मे नही करना चाहिए। जैसे गेहूँ के आँटे से बने लड्डू, मैदे से बने पदार्थ, चावल के आँटे से बने लड्डू, नमक; मिर्च, जीरा और पानी डालकर बनाया हुआ चावल का घोल (इसे मराठी में खिशी और गुजराती में खीचू बोलते है)। संक्षिप्त मे आँटे से बने वो सभी पदार्थ जिसमे आँटा अपने मूल स्वरूप मे रहे। रोटी, गेहूँ के पापड, चावल के पापड यह इस श्रेणी मे नही आते क्योंकि इन आहार वस्तुओं को बनाते वक्त आँटे पर अग्नि का संस्कार होकर गुणधर्मों मे परिवर्तन होता है।
6) अम्लद्रव्य अर्थत जिसका स्वाद खट्टा हो। खट्टा स्वाद (अम्ल रस) शरीर धातुओं मे शैथिल्य उत्पन्न करता है। उनका प्राकृतिक सौष्ठव (built) नष्ट करता है। परिणामतः व्याधी बढने लगता है। इसलिए त्वचारोगियों को अम्लरस सेवन नही करना चाहिए। इसमें नींबू, छाछ, दही, कोकम, कढी, इमली, टमाटर ये सब चीजे आ गई।
7) विरुद्ध भोजन - दो ऐसे अन्न पदार्थ जिनका संयोग शरीर के लिए अनुकूल नही होता - उनका एकत्र सेवन विरुद्ध भोजन कहलाता है। जैसे प्रत्यक्ष नमक या नमक मिली हुई आहारवस्तुओं के साथ दूध पीना या खाना। अम्ल रसात्मक वस्तुओं के साथ दूध खाना। फलों के साथ दूध सेवन करना इत्यादि
8) पहले खाये हुए आहार का पाचन होने से पूर्व ही पुनः भोजन करना भी त्वचारोगियों के लिए निषिद्ध है। एक बार किया हुआ भोजन पचने मे कमसे कम 3 घण्टे लगते ही है। इसलिए पूर्ण आहारसेवन के पश्चात 3 घण्टे तक कुछ भी खाना नही चाहिए।
9) अजीर्णावस्था मे भोजन - कई बार सुबह भोजन ग्रहण के पश्चात शामतक उसका सम्यक पाचन नही होता। फिर भी कुछ लोग खाना तो खाते ही है। यह स्थिती अगर बारंबार उत्पन्न होती रही, तो निश्चित त्वचारोग उत्पन्न होते है। इसलिए अजीर्णावस्था मे उपवास ही करना ही श्रेयस्कर होता है।
9) विदाही अन्न सेवन - विदाही अन्न अर्थात जिसके सेवन से दाह अर्थात जलन उत्पन्न हो। जैसे लाल, मिर्च, काली मिर्च एवं मसालों मे सम्मिलित अन्य सभी घटकद्रव्य। ऐसा विदाही अन्न रक्त को दूषित कर त्वचारोग उत्पन्न करता है। इसलिए अतिविदाही अन्न सेवन का त्वचारोगों मे वर्जन करना चाहिए।
10) अभिष्यंदी अन्न सेवन - अभिष्यंदी अर्थात ऐसा अन्न जिसे खाने के बाद शरीर धातुओं से स्त्राव निकलना शुरू हो जाते है, जैसे दही या कच्चा कैंथ (Indian wood apple)। ये दो पदार्थ खाने के बाद रस, रक्त, मांसादि धातुओं मे क्लिंन्नता (Excess Moisture) उत्पन्न होकर उनका व्याधिक्षमत्व कम हो जाता है। दोषों का प्रकोप होता है। फलस्वरूप त्वचारोगों की उत्पत्ति होती है।
11) तिल और गुड - आचार्यों ने तिल और गुड को भी त्वचारोगों का जनक माना है। दोनों पदार्थ गुणों से उष्ण है। इनका अतिसेवन रक्त को दूषित करता है। इसलिए तिल और गुड को अलग - अलग या एकत्र करके 'अति' मात्रा मे न खाए। परंतु त्वचारोग अगर पहले से ही उपस्थित है, तो इनका सेवन न करना ही इष्ट होता है। यह देखा गया है की तिल और गुड का अतिमात्रा सेवन मूलतः खुजली बढाने मे सहाय्यक होता है। इसलिए त्वचारोगों की चिकित्सा के दरम्यान इनका सेवन न करें।

अपथ्य विहार

विहार अर्थात प्रवृत्ति (activity)। अपथ्य विहार मतलब ऐसी कर्मप्रवृत्ति जो रोगोत्पादक हो अथवा रोगों को बढाये या उनकी यथास्थिती बनाये रखे। अपथ्यविहार का ही अन्य नाम कारण (Cause) है। इसलिए इस एक ही बिंदु में कारण और अपथ्यविहार यह दोनों मुद्दे समाहित हो जाते है।
आयुर्वेद के अनुसार निम्नलिखित कारणों से त्वचारोगों की उत्पत्ति होती है।
1) अगर किसी का जी मचल रहा हो और उसे अब उलटी होनेवाली हो, तो ऐसे उलटी के आनेवाले वेग को जबरदस्ती रोकना।
2) मल, मूत्र तथा अपानवायु के वेगों को रोकना। क्वचित ऐसा वेग रोकना पड़ा, तो कोई बडी समस्या उत्पन्न नही होती। परंतु यही स्थिती अगर बारबार उत्पन्न हो, तो वह त्वचारोगों को उत्पन्न करने मे सक्षम होती है।
3) भरपेट भोजन करने के बाद तत्काल व्यायाम करना अथवा कोई मेहनतवाला काम करना। आयुर्वेद में भोजन के बाद सिर्फ 100 कदम चलने का उपदेश है। परंतु कुछ वैद्य 2000 कदम चलने की सलाह देते है जो शास्त्रानुरूप नही है और कुछ लोग इधर उधर से पढ़कर सुनकर खाने के बाद ही 2-4 किलोमीटर घूमकर आते है। भोजन के त्वरित बाद इतना ज्यादा घूमना पाचन के लिए हानिकारक होता है। इसलिए भोजन के बाद मेहनतवाला काम या व्यायाम वर्जित करे। मेहनत का कोई भी काम भोजन के 45 मिनिट बाद ही करे।
4) अधिक धूप मे काम करना या आग/उष्णता के पास सतत काम करना।
5) सामान्य आहारवस्तु सेवन का भी एक विशिष्ट क्रम होता है। उस क्रम का पालन नही करने से भी त्वचारोग उत्पन्न होते है। जैसे अगर आपने आईस्क्रीम खाया, तो उसके बाद जब तक मुँह के भीतर का तापमान ठण्डे तापमान से सामान्य तापमान तक नही होता, तब तक सादा पानी या गरम पानी नही पीना चाहिए ऐसा नियम है। परंतु लोग ऐसे क्रम का पालन नही करते और आईस्क्रीम के बाद तुरंत सादा पानी पी लेते है। कुछ लोग गरमागरम चाय पीने के त्वरित पहले ठण्डा पानी पीते है या चाय पीने के बाद मुँह की मिठास या चिकनाहट दूर करने के लिए त्वरित सादे ठंडे पानी से कुल्ला करते है। इसे ही क्रम छोडना कहते है। एसी (Air Conditioner) मे बैठे लोग भी एक क्षण के लिए बाहर जाते है, तो दूसरे ही क्षण मे फिर से एसी के ठंडे तापमान में वापस आते है। ऐसा करना भी त्वचा के लिए हानिकारक होता है। 
6) आज पूर्णोपवास करने के बाद तुरंत आनेवाले कल में उसका बैकलॉग निकालने के लिये भरपेट भोजन करना और फिर से उपवास करना। ऐसा उपवास - आहारसेवन का सतत व्यत्यास (Alternate) क्रम भी त्वचारोग निर्माण करने मे सहायक होता है। इसलिए ऐसी आदतों को त्यागना हितकर होता है।
7) धूप मे बहोत समय तक घूमने - फिरने के बाद, अत्याधिक मेहनत/व्यायाम करने के बाद तथा जो व्यक्ति किसी कारणवश अचानक डरा हुआ है, ऐसे व्यक्ति अगर इन क्रियाओं के बाद तुरंत द्रुतगति से पानी पीते है। तो ऐसी स्थिती भी त्वचारोगो के निर्माण के लिए पोषक वातावरण उत्पन्न करती है। गर्मी के दिनों मे यह परिस्थिती ज्यादा देखने को मिलती है कि हम शॉपिंग या अन्य किसी काम के बहाने बहोत देर तक घूमते फिरते है और घर आने के बाद कुछ ही मिनटों मे 2-4 लोटे पानी इतनी तेजगती से पीते है की मानो कई वर्षों बाद पानी पीने मिला हो।
आयुर्वेद के अनुसार उपरोक्त तीनों क्रियाओं मे शरीर का तापमान बाह्य तापमान के समकक्ष होता है। छाँव मे आने के बाद जब तक यह तापमान सामान्य (up to room temperature) नही होता, तब तक पानी नही पीना चाहिए। यह तापमान सामान्य करने के लिए ही बाहर से आने के बाद हाथ-पैर-मुँह ठण्डे पानी से धोना चाहिए और संभव हो तो पंखे के नीचे बैठना चाहिए। जिससे शरीर का बढा हुआ तापमान शीघ्र ही सामान्य होने मे मदद मिलती है। उसके पश्चात ही पानी पीना चाहिए। सनद रहे कि बाहर से आने के बाद शरीर का तापमान सामान्य करने के लिए एसी (Air Conditioner) वाले कमरे में बैठना नही चाहिए।
8) शरीर शुद्धि के लिए किये जानेवाले पंचकर्म के दरम्यान बहोत सख्ती से नियमों का पालन करना पडता है। इन नियमों का अगर थोडा भी उल्लंघन हुआ तो वह त्वचारोगों का कारण बन सकता है। अतःएव पंचकर्म करते वक्त वैद्यराज द्वारा निर्देशित सभी सूचनाओं का अनिवार्यतः पालन करना चाहिए।
9) दही, मछली जैसे क्लिन्नता उत्पन्न करनेवाले पदार्थों का सेवन करना। नमक तथा खट्टे पदार्थों का अतिमात्रा मे सेवन करना। सब्जी मे नमक है की नही यह देखे बगैर कई बार हम देखते है की कुछ लोग खाना खाने से पहले ही सब्जीपर नमक छिडकना शुरू कर देते है और कुछ लोगो को तो सब्जी, दाल सबमे नींबू निचोडें बगैर खाना अच्छा ही नही लगता। इतनी अतिमात्रा मे नमक तथा खट्टे पदार्थों का सेवन रक्त दूषित कर देता है। परिणामस्वरूप रक्तधातु से संबंधित त्वचा के विकार उत्पन्न होते है।
10) भोजन के भली-भाँति पचने से पहले मैथुन करना। यह प्रवृत्ति मुख्यतः नवविवाहित दंपतियों में पायी जाती है। इसलिए तुलनात्मक दृष्टया इन दाम्पत्यों में त्वचारोग तथा आमवात, अजीर्ण जैसे व्याधि ज्यादा मिलते है।
11) दिन मे सोना यह भी एक कारण है जो आयुर्वेद में निर्दिष्ट है। दिन में सोने में विशेषरूप से माँसधातु दूषित होकर व्याधि के रूप मे त्वचापर उनकी अभिव्यक्ति होती है।
 उपरोक्त सभी कारण सिर्फ एक बार सेवन करने से त्वचारोग निर्माण नही होते। उसके लिए इन कारणों के सतत सेवन की आवश्यकता होती है। इसलिए एक ही बार दही खाने से अथवा एक ही बार विरुद्ध भोजन करने से कभी त्वचारोग नही होता। परंतु अगर त्वचारोग पहले से ही है, तो उसे यथास्थिती बनाये रखने मे अथवा बढाने मे यह सभी कारण निश्चित सहाय्यभूत होते है, यह ध्यान रखे एवं उनका वर्जन करे। अन्यथा एक छोटे से छोटा त्वचारोग भी वर्षोंतक आपको पीड़ित करने की क्षमता रखता है।
12) ब्राम्हण (कर्म से) तथा गुरुजनों का अपमान या तिरस्कार करनेवाले तथा पापकर्मों को करनेवालों को त्वचारोग उत्पन्न होते है ऐसा आयुर्वेद कहता है। आयुर्वेद का यह विचार अन्य स्वास्थ्यविज्ञानों से पूर्णतः अलग है। अन्य विज्ञान व्याधिनिर्माण की प्रक्रिया में ऐसे अधिदैविक (Metaphysical) कारणों का विचार नही करते। परंतु आयुर्वेद मे ऐसा स्पष्टतः कहा गया है। कई बार हमारे पास त्वचारोग का रुग्ण आता है। फिर हम उसका इतिहास पूँछते है और हमे यह ध्यान मे आता है की रुग्ण तो एकदम धार्मिक है, दिनचर्या - ऋतुचर्या का भी अचूक पालन करता है, सादा सौंफ खाने का भी रुग्ण को व्यसन नही। चाय, पान, मसाला तो दूर की बात है, फिर भी रुग्ण को सोरायसिस जैसे असाध्य व्याधी उत्पन्न होते है। आधुनिक विज्ञान के पास ऐसे लोगो को देने के लिए उत्तर नहीं होता। परंतु आयुर्वेद तो स्पष्टरूप पर चर्मरोगों के लिए पापकर्म का कारण मानता है और इसका प्रत्यय हमे आता भी तब है, जब अनेकानेक प्रयत्न करने के बावजूद भी रुग्ण को व्याधिलक्षणों मे तिलमात्र भी फर्क नही पडता। इसलिए त्वचारोगों की उत्पत्ति में यह एक दृष्टिकोण भी ध्यान मे रखे। अस्तु। शुभम भवतु।
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