Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 13 Dec 2018 Views : 999
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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त्वचारोग आहारविहार मार्गदर्शन

अनुचित आहारविहार तथा अनुचित जीवनशैली के कारण आज भारतवर्ष मे त्वचारोगों (Skin diseases) का प्रमाण 10 से 12 प्रतिशत जितना हो गया है। परंतु केवल आहार (Diet) - विहार (Activity) का ही उचित ध्यान रखा जाए, तो त्वचारोगों का यह प्रमाण बहोत हद तक कम किया जा सकता है।

वस्तुतः अगर देखा जाये तो आयुर्वेद ने आहार के बारे विस्तार से मार्गदर्शन किया ही है। परंतु ब्रिटिशों की जीवनशैली तथा पश्चिम की आहारशैली आत्मसात करने के कारण हम अपने ही आयुर्वेद के उपदेशों को भूल चुँके है। अतःएव स्वस्थ रहना है, तो आयुर्वेद द्वारा प्रतिपादित आहार विहार के नियमों का पालन करना ही पडेगा अन्यथा त्वचारोग तथा तत्सम अन्य समस्या उत्पन्न होती ही रहेगी और मनुष्य प्रताडीत होता ही रहेगा।

त्वचारोगों मे पथ्याहार

पथ्य अर्थात शरीर के लिए उपकारक और पथ्याहार मतलब शरीर के लिए योग्य उपकारक आहार। आयुर्वेद मे प्रत्येक व्याधी का वर्णन करते समय पथ्याहार का मार्गदर्शन किया हुआ ही है।

1) आयुर्वेद के अनुसार सभी त्वचारोगों मे जल्दी पच जाने वाले (लघु) अन्नपदार्थों का सेवन करना चाहिए। जैसे जौ, जुआर की रोटी, जुआर की धानी। इनका सेवन करने के बाद ये जल्दी पच जाते है। पाचनसंस्थान को इन्हें पचाते समय कष्ट नही होता। परिणामस्वरूप उत्तम गुणात्मक शारीर धातु उत्पन्न होते है, जो शरीर को स्वस्थ रखते है।

2) सब्जियों के बारे मे निर्देश दिया है की जो सब्जियाँ स्वाद मे कडवी होती है। उनका सेवन करना चाहिए। जैसे करेला, चक्रमर्द जीवंती, मेथी, शेरण्या। नही तो सब्जी बनाते वक्त उसमे नीम के फूल अथवा कोमल पत्तिया डालना चाहिए। सब्जी मे भिलावा तथा त्रिफला डालने का भी विधान है। भिलावे के फल मे एक पिला भाग तथा एक काला भाग होता है। सब्जी मे इस पीले भाग का उपयोग करना चाहिए ऐसा विद्वानों का मंतव्य है। त्रिफला से जल सिद्ध करके उसका सब्जी बनाने मे उपयोग करना चाहिए। अब यह तो सामान्य बात है की त्रिफला काढा से भावित अन्न स्वाद जरा भी अच्छा नही होगा। परंतु ठीक होना है, तो ऐसे पथ्य आहारों का सेवन करना ही पडेगा। अन्यथा आपने देखा ही होगा कि एक साधारणसी दाद या खाज वर्षों तक चलती है।

एक बात यहाँ ध्यान देने जैसी है कि भिलावा और त्रिफला वस्तुतः औषधियाँ है। यह आहार द्रव्य नही है। फिर भी आचार्यों ने इन्हें आहार मे सेवन करने की सलाह दी है। इसका अर्थ यही है की व्याधीबल अधिक होने के कारण केवल औषधिरूप मे इनका सेवन पर्याप्त नही है। इसलिए आचार्यों ने इन दो औषधियों को त्वचारोगों का पथ्याहार बताते समय आहार मे भी स्थान दिया है। चिकित्सा के रूप मे यह भी कदाचित कम ही होता होगा, इसलिए आचार्यों ने भिलावा, त्रिफला तथा नीम के फुलपत्तो से साधित घी का सेवन भी करने को बताया है।

3) आगे बढते हुए आचार्यो ने त्वचारोगों के पथ्याहार मे पुराणधान्य सेवन का निर्देश दिया है। पुराणधान्य मतलब 1 साल पुराना धान्य। आचार्यों ने इसके सेवन की सलाह दी है। इसलिए नया अनाज लेने के बाद उसे धूप मे सुखाकर, कोठी मे सुरक्षित रख देना चाहिए और एक साल के बाद उसका खाने में उपयोग करना चाहिए।

अभी अभी 80-90 के दशकों तक गाँवों मे 1 वर्ष के बाद का पुराणधान्य खाने की ही परंपरा थी। उस वक्त अनाज धूप में सुखाकर जमीन के अंदर कुँए जैसा विवर बनाकर एक वर्ष के लिए उसमे रखकर, बाद मे उपयोग करने की परंपरा थी। परंतु जैसे जैसे व्यस्तता बढती गयी और जगह कम पडती गयी, यह परंपरा लुप्तप्राय हो गयी। वस्तुतः अनाज ऐसे एक वर्ष तक रखने से वह गुणों में लघु अर्थात पाचन मे हल्का हो जाता है। जल्दी पाचन होने से पाचनतंत्र भी स्वस्थ रहता है और स्वस्थ पाचनतंत्र ही पूर्ण स्वास्थ्य का आधा हिस्सा है। इसलिए त्वचारोगियों को पुराण धान्य का ही सेवन करना हितकर होता है।

4) दालों मे मूँग की दाल श्रेष्ठ बताई है क्योंकि वह पाचन मे हल्की होती है और बारा महीने सेवनयोग्य होती है। परंतु यह ध्यान रहे की मूँग की दाल भी सेन्द्रिय (organic) होनी चाहिए, न की हाइब्रिड। एवं संभव हो तो तब तक मूँग की दाल छिलके के साथ ही खानी चाहिए। मूँग की दाल भी तैयार होने के एक वर्ष बाद ही खाने के उपयोग मे लेनी चाहिए।
आचार्यों के अनुसार तुवर की दाल का भी त्वचारोगो में सेवनार्थ उपयोग किया जा सकता है। परंतु सांप्रत उपलब्ध तुवरदाल हाइब्रिड होने के कारण पित्तशमन करने की बजाए पित्तवृद्धि ही करती है। इसलिए त्वचारोगों मे आज उपयोग मे लाई जानेवाली तुवरदाल का उपयोग नही करना चाहिए। हालाँकि सेंद्रिय पद्धती से उगाई तुवरदाल का निश्चित उपयोग किया जा सकता है।

पथ्यविहार

विहार अर्थात प्रवृत्ति (Activity)। पथ्य विहार अर्थात ऐसे कर्म जो शरीर के लिए उपकारक हो।

त्वचारोग हो ही नही इसके लिए तथा होने के बाद उन्हें ठीक करने के लिए क्या क्या करना चाहिए इसका वैसे तो आयुर्वेद में कोई सीधा सीधा संदर्भ नही है। परंतु त्वचारोगों के कारणों का वर्णन है। इन्ही कारणों को टालना ही पथ्य विहार के अंतर्गत समाविष्ट होता है। फिर भी त्वचा स्वस्थ रहे इस हेतुसे निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए।

1) नियमित हल्के गर्म पानी से स्नान करें एवम स्नान के बाद तौलिए से रगड़ रगड़ कर शरीर को पोछकर सुखाए।

2) नियमित तिल तैल, नारियल तैल अथवा अन्य कोई भी सिद्ध तैल से नियमित शरीर की मालिश करनी चाहिए। इससे त्वचा कोमल तथा व्याधिक्षम बनती है।

3) नहाते समय केमिकल शैम्पू या साबू की जगह कोई आयुर्वेदिक अंगराग पावडर अथवा उबटन का उपयोग करना चाहिए। इससे त्वचा पर जमा हुआ मैल निकल जाता है एवं त्वचा सुदृढ तथा कांतिमान होती है।

4) त्वचा को नर्म एवम कोमल रखने के लिए आजकल जो पेट्रोलियम जेली का उपयोग किया जाता है, उसका उपयोग न करे। पेट्रोलियम जेली के उपयोग से त्वचा का व्याधिक्षमत्व बहोत कम हो जाता है। परिणामस्वरूप छोटे से छोटे चर्मरोग भी जल्दी ठीक नही होते।

5) सदैव सूती कपड़े पहनें। टेरीकॉट, टेरिलीन तथा अन्य सिंथेटिक धागों से बनाये हुए कपड़ो का उपयोग न करे।

6) बहोत ज्यादा धूप में घूमना नही चाहिए तथा बहोत ज्यादा ठंडी में त्वचा खुली रहे ऐसे कपडे भी नही पहनना चाहिए।

7) बाहर से आने के बाद संभव हो तो पुनः हल्के गर्म पानी से नहाना चाहिए इससे पूरे दिनभर त्वचा पर जमी धूल निकल जाती है एवं पसीने की परत भी साफ हो जाती है।

8) सप्ताह में एक बार नहाने से पहले बाष्प स्वेद (Steam bath) लेना चाहिए जिससे स्वेदग्रंथियाँ खुली होकर संचित मैल निकल जाता है एवं त्वचा स्वस्थ रहती है।

इन नियमों का पालन त्वचा को स्वस्थ रखता है। फिर भी अगर त्वचारोग हुए तो इनका पालन करने से त्वचारोग सहज साध्य होते है अथवा नियंत्रित रहते है।

अस्तु। शुभम भवतु।

श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत