Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 29 Nov 2018 Views : 420
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
29 Nov 2018 Views : 420

क्या सोरायसिस ठीक होता है?

कुछ व्याधि जीवनशैली से संबंधित होते है। सामान्य जीवनशैली से व्यस्त जीवनशैली के तरफ जाते जाते बीच मे ही इन व्याधियों की उत्पत्ति होती है। इसलिए ऐसे व्याधियों को जीवनशैली विकार (Lifestyle disorder) ऐसे कहां जाता है। सोरायसिस (Psoriasis) इन जीवनशैली विकारों में से ही एक व्याधि है। स्वातंत्र्यपूर्व काल मे भारतवर्ष में सोरायसिस की उपस्थिति नहिवत थी। 80-90 के दशक में भी यही स्थिती थी। परंतु जैसे जैसे कॉर्पोरेट सेक्टर भारत मे आते गया वैसे वैसे एक सामान्य भारतीय का जीवन भी अत्यंत व्यस्त एवम तनावपूर्ण हो गया। परिणामस्वरूप सोरायसिस जैसे जीवनशैली विकारों का प्रादुर्भाव होता गया और वर्तमान स्थिती यह है कि सोरायसिस एक अत्यंत सामान्य व्याधि के सूची में आ गया। इसका इतनी ज्यादा मात्रा में प्रसार हुआ कि अधिकांश लोग घर पर ही इसका निदान कर लेते है। सिर्फ सोरायसिस ही है या नही इसकी पुष्टि करने हेतु डॉक्टर के पास जाते है। इसकी दहशत भी इतनी है कि शरीर पर एक छोटासा चकत्ता भी आ गया तो भी सामान्य लोग उसे सोरायसिस मान लेते है।
मनुष्य शरीर मे सोरायसिस उत्पन्न होने का कोई निश्चित स्थान नही होता। किसी के शरीर मे यह सिर से शुरू होगा, किसी के शरीर मे संधिस्थानो के बाह्यभाग से शुरू होगा, किसी के शरीर मे हाथ पैरों के तलुओं से शुरू होगा तो किसी शरीर मे गुह्यभाग से शुरू होता है। किसी व्यक्ति को तो कुछ खरोचने का ही निमित्त हो जाता है कि वही से सोरायसिस शुरू हो जाता है। यह खरोच आपके खुजाने से भी हो सकती है या किसी अन्य कारण से।
उत्पन्न होने के बाद अधिकांशतः यह शरीर के एक छोटे हिस्से में व्याप्त होता है और अगले कई वर्षों तक वही बना रहता है। परंतु कुछ लोगो मे इससे विपरीत स्थिती देखने को मिलती है - जैसे उत्पन्न होते ही दो चार महीने में ही सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है। फिर इसके बाद उस रुग्ण की चिकित्सा के लिए परेड शुरू होती है। कौनसी चिकित्सा ले यही समझ नही आता। फिर इंटरनेट पर सोरायसिस के बारे में सर्च करना शुरू कर देता है। समदुःखी लोगो से मिलकर उनसे चिकित्सा के अनुभव जानना शुरू कर देता है। तरह तरह की आरोग्यपत्रिकाए तथा समाचार पत्रों के स्वास्थ्य कॉलम में सोरायसिस के बारे में पढ़कर उस व्याधि को समझने का प्रयत्न करता है। परंतु एक प्रश्न सदैव उसके मन मे उपस्थित होता रहता है कि क्या सोरायसिस ठीक होगा? और दुर्भाग्य से इस प्रश्न का उत्तर है - नही।
सोरायसिस ये मुख्यतः उन लोगो को होता है जिनका न खाने का समय होता है न सोने का। ये उन लोगो को भी होता है जिनकी जीभ उनके नियंत्रण में नही होती। जो मन मे आया वो स्वादपूर्ति के लिए खाते ही है। हम जो खा रहे है वो स्वास्थ्य के लिए हितकर है या नही ऐसा कोई विचार गलती से भी इनके मन मे आता नही। जो लोग दोपहर में भोजन के बाद तुरंत सो जाते है। जो लोग खट्टी तथा तली हुई चीजें बहोत ज्यादा मात्रा में खाते है और इतना अपचार करने के बाद भी उचित समय पर शरीर शोधन (पंचकर्म) नही करते उन लोगो मे सोरायसिस होने का प्रमाण ज्यादा देखा गया है। इसके सिवा जो लोग सदैव तनावपूर्ण स्थिती में रहते है ऐसे लोगो मे भी सोरायसिस जैसे व्याधियों की उत्पत्ति देखी जाती है।
सोरायसिस की एक विशेषता है कि यह एक बार उत्पन्न हुआ कि फिर कभी ठीक नही होता। फिर भले वह अल्प प्रमाण में हो या सम्पूर्ण शरीर मे। यह सोरायसिस का कड़वा सच है और आज नही तो कल पीड़ित रुग्ण को इस स्थिती को स्वीकारना ही पड़ता है।
सोरायसिस भले ठीक न हो परंतु अगर नियमित औषधसेवन किया तो वह सौ फीसदी नियंत्रण में रहता है। व्याधि के ऐसे स्वभाव को आयुर्वेद 'याप्य' कहता है। अर्थात जब तक रोगी का औषधिसेवन चालू है तब तक उसे आराम रहता है और जैसे ही औषधि बंद करेगा, एक- दो महीने में व्याधि के लक्षण पुनः उत्पन्न हो जाते है। इसलिए सोरायसिस जैसे व्याधियों में आजीवन औषधिसेवन चालू ही रखना पड़ता है। कुछ रुग्ण ऐसा सुनकर प्रतिप्रश्न करते कि अगर सोरायसिस ठीक ही नही होनेवाला तो औषधि क्यों ले? और आयुर्वेद भी अगर इसे ठीक नही कर सकता तो आयुर्वेद की इतनी कड़वी औषधियाँ क्यों खाए? इससे तो एलोपैथी की औषधि अच्छी है, बस गोली निगल लो और ऊपर से पानी पीओ।
अब व्यावहारिक दृष्टि से अगर देखा जाए तो रुग्ण ने जो विचार किया उसमे जरा भी गलत नही। परंतु सच तो यह है कि एलोपैथी की औषधियों से भी सोरायसिस पूर्णरूप से नियंत्रित नही होता, ऊपर से एलोपैथी औषधियों के दुष्परिणाम सहन करने पड़ते है, वो तो अलग ही बात है। फलस्वरूप व्याधि आगे बढ़ता ही रहता है और कुछ वर्षों के बाद सोरायसिस में ही संधिवात के लक्षण उत्पन्न हो जाते है जिसे आधुनिक विज्ञान Psoriatic arthropathy के नाम से जानता है। सोरायसिस के अंतर्गत संधिवात के यह लक्षण कभी कभी इतने उग्र रहते है कि रुग्ण अक्षरशः पंगु हो जाता है। उसका उठना, बैठना, चलना - फिरना दूभर हो जाता है। सतत बढ़नेवाली यूरिक एसिड की लेवल संधिवात को और पेचीदा बना देती है। त्वचा विकृति दिन प्रति दिन बढ़ती ही जाती है और अंत मे त्वचा गेंडे के चमड़ी जैसी काली एवं मोटी हो जाती है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा भले ही स्वाद में अप्रिय हो, दीर्घकाल चलनेवाली हो तथा सुविधाजनक न हो, परंतु सोरायसिस को तो सम्पूर्ण नियंत्रण में रखती है। इतना ही नही कुछ वर्षों के पश्चात उसमे उत्पन्न होनेवाले उपद्रवों को उत्पन्न ही नही होने देती। नियमित चिकित्सा, शतप्रतिशत परहेज का पालन तथा पंचकर्म करके अगर आयुर्वेदिक चिकित्सा का अनुसरण किया जाए, तो रोगी व्यक्ति एक ऐसी अवस्था (Remission period) में प्रवेश करता है कि मानो उसे सोरायसिस क्या, कोई अन्य व्याधि भी नही है, ऐसा आभास होता है, इतना रोगी स्वस्थ दिखता है। परंतु सोरायसिस की एक अन्य समस्या भी है। इस व्याधि की उत्पत्ति तथा स्थिती में मानसिक भावों की भी भूमिका रहती है। इसलिए आप कितनी भी नियमित औषधि लीजिए या पंचकर्म कीजिए, व्यक्ति अगर थोड़ा भी मानसिक रूप से विचलित हो जाये तो कम से कम एक चकत्ता (Skin lesion) तो शरीर पर कही न कही प्रकट हो ही जाता है। इसलिए सोरायसिस में औषधिसेवन के साथ साथ मानसिक स्वास्थ्य का भी बहोत ध्यान रखना पड़ता है। सोरायसिस से पीड़ित व्यक्ति के घर ने अगर कोई मृत्यु को प्राप्त हो जाए या उसे व्यवसाय में प्रचंड आर्थिक हानि हो जाए या फिर लड़के- लड़की के शादी, शिक्षण की चिंता उसे सताती रही हो, तो मानसिक स्वास्थ्य का यह विचलन इस व्याधि को पुनः गति देकर त्वचा पर प्रकट करता ही है। इन सभी भावों के कारण सोरायसिस एक 'याप्य' व्याधि बन चुका है। यह कभी भी पूर्णरूप से ठीक नही होता यह ध्यान रखे। एक बार हुआ मतलब उसीके साथ जीवनयापन की कला सीखनी पड़ती है। जीवन का एक अंग समझकर ही उसकी चिकित्सा चालू रखकर उसका प्रतिकार करना पड़ता है।
अस्तु। शुभम भवतु।
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