Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 15 Nov 2018 Views : 378
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
15 Nov 2018 Views : 378

आप असली मक्खन खा रहे हो या नकली?

ब्रिटिश भारतवर्ष मे आये तबसे भारतीयों की जीवनशैली ही बदल गयी है। देसी आहार से एक एक पोषक वस्तु गायब होने लगी और उसकी जगह हायब्रिड आहार वस्तु लेने लगी। प्राचीन काल मे एक गरीब परिवार भी शुद्ध देसी घी का सेवन करता था। पाश्यात्य काल मे उसे वनस्पति घी भी मिलना मुश्किल हुआ, इतना भारतीयों का आर्थिक स्तर नीचे आ गया। इस दरम्यान दुष्ट बुद्धि मनुष्य द्वारा प्रत्येक आहार वस्तु मे उसका स्वरूप कायम रखते हुए आमूलाग्र बदल किए गए। जैसे दूध का ही उदाहरण लीजिए। दूध तो आज भी दूध जैसा ही दिखता है पर वह सच मे दूध ही है या शैम्पू और यूरिया से बनाया हुआ दूध जैसा सफेद प्रवाही है इसमे आप भेद नही कर सकते। मक्खन की भी आज यही स्थिती है। बाजार मे मिलनेवाला मक्खन, मक्खन ही है या मार्जारीन यह आप फर्क ही नही कर सकते। इसलिए परिस्थिती बिकट बनी हुई है। नकली को असली समझकर खाने मे समस्या यह रहती है की व्यक्ति क्या खाया उसकी चिंता नही करता क्योंकि उसके हिसाब से उसने जो भी खाया होता है वह असली होता है, फिर भले हो वह नकली क्यों न हो। इसलिए वह असावधान रहता है। इसी लापरवाही के दरम्यान जो नकली खाद्यवस्तु (असली समझकर खाई हुई) शरीर मे पहुँची है, वह अपना कार्य करती रहती है और फिर अचानक कभी एक दिन कोई अप्रिय घटना बन जाती है। इसलिए आज से 2000 वर्ष पूर्व ही आयुर्वेद ने बाहर के खाने का निषेध किया हुआ है। बाहर खाने का अन्य कोई विकल्प उपलब्ध ही नही, ऐसे मजबूरी की स्थिती मे ही बाहर का खाना लेना चाहिए। परंतु घर होकर बाहर हॉटेल मे खाने के लिए जाना मतलब आत्मघात नही तो क्या है? 

हॉटेल 5 स्टार हो या रेहडी पर का खाना हो, बनानेवाले को मुनाफा चाहिए होता है। इसलिए ही तो वह व्यवसाय लेकर बैठा होता है। ऐसी स्थिती मे खाना जितना सस्ता होगा उतना लोग उसके फुड स्टाल या होटल मे आयेंगे। ऐसे खाने मे अगर उसने असली मक्खन का उपयोग किया तो उतना ही उसका मुनाफे का मार्जिन कम होता है। इसलिए रेहडीवाला हो या 5 स्टार हॉटेलवाला हो मक्खन की बजाए वैसा ही दिखानेवाला, स्वाद मे भी हुबहु वैसा ही लगानेवाला वनस्पती घी से बनाया हुआ मक्खन उपयोग मे लाते है जिसे मार्जारीन (Margarine) ऐसे बोला जाता है।

मार्जारीन को इंग्लिश मे इमीटेशन बटर (Imitation butter) कहा जाता है, जैसे आजकल इमिटेशन ज्वेलरी होती है, बस वैसे ही। रूप, रस, गंध सभी गुणों से असली मक्खन जैसा ही लगता है। परंतु जब मूल गुणधर्मों की बात आती है, तब मार्जारीन और असली मक्खन दोनो मे जमीन आसमान का फर्क होता है।

असली मक्खन छाँछ को बिलोकर निकाला जाता है। आयुर्वेद ने मक्खन के गुण बताते हुए गाय, भैंस और बकरी के मक्खन के अलग अलग बताए है।

गाय के दूध से निकाला हुआ मक्खन :

गाय का मक्खन शीत गुणात्मक होता है। मैथुनशक्ति वर्धक होता है। शरीर के वर्ण को उज्वल बनानेवाला, शरीर का बल तथा पाचनशक्ति बढ़ानेवाला होता है। गाय का मक्खन संग्राहक होता है, मतलब इससे मल अच्छी तरह बँधा हुआ आता है। वात तथा पित्तदोष अगर बढा हो तो उसे कम करने का कार्य गाय का मक्खन अच्छी तरह से करता है। बवासीर (Piles), वजन कम होना (Weight loss or Cachexia), मुँह के लकवे (Facial paralysis) मे तो गाय का मक्खन अद्भुत कार्य करता है, बशर्ते की यह प्रयोग वैद्यजी की देखभाल मे ही करे। यह खाँसी को भी प्रभावी तरीके से कम करता है। गाय का मक्खन बालक तथा वृद्धों के लिए हितकर बताया है और विशेष कर शिशुओं को रोज ताजा मक्खन चटाना चाहिए।

भैंस के दूध से निकाला हुआ मक्खन :

भैंस का मक्खन गाय के मक्खन की तुलना में अधिक शीत गुणात्मक होता है। इसलिए भैंस का मक्खन वात और कफ को बढ़ाता है। पचने मे भारी होता है। पित्त का शमन करता है। बहोत ज्यादा काम करने के बाद जो थकावट आती है, उसे दूर करता है। मतलब अगर आप कोई पदयात्रा करके आये हो या फिर बिना विश्राम लिए आपने सतत 48 घंटे काम किया हो तो ऐसे वक्त मनुष्य अतिदुर्बलता का अनुभव करता है। भैंस का मक्खन इस तरह से उत्पन्न भयंकर थकावट को नष्ट कर देता है। इसलिए अत्यंत श्रमजीवी लोगो को भैंस का मक्खन सेवन करना चाहिए। यह शरीर मे मेद भी बढाता है, इसलिए वजन बढाने के लिए इच्छुक पतले लोगो को वैद्यराज के मार्गदर्शन में इसका सेवन करना चाहिए।
भैंस का मक्खन शुक्रवृद्धि भी करता है। इसलिए नित्य मैथुन करनेवाले लोगो को इसका अवश्य सेवन करना चाहिए।

बकरी के दूध से निकाला हुआ मक्खन :

आयुर्वेद के अनुसार बकरी का मक्खन त्रिदोषनाशक होता है और गाय - भैंस के मक्खन से भी श्रेष्ठ होता है।

परंतु उपरोक्त तीनों मक्खन प्रकारों के बारे मे एक बात अवश्य ध्यान मे रखना जरूरी है की यह गुणधर्म मानवी शरीर को तभी उपलब्ध होते है जब मक्खन ताजा हो। 24 घंटे पुराने या महीनों तक फ्रीज में रखे हुए मक्खन मे यह गुणधर्म नही होते। ऊपर से आज की तरह उस मक्खन में नमक मिलाया हुआ हो तो क्या कहने! मतलब करेला और नीम चढ़ा।

आयुर्वेद पहले ही पुराना मक्खन खाने का निषेध करता है। क्योंकि पुराना मक्खन स्वाद में बहोत खट्टा हो जाता है और खाने से उल्टी भी शुरू हो सकती है। बवासीर उभर सकती है और अगर पहले से है, तो बढ सकती है। त्वचारोग उत्पन्न होता है और पहले से है तो बढता है। पुराना मक्खन पचने मे अत्यंत भारी, विकृत कफ को बढनेवाला तथा विकृत मेद धातू को भी बढ़ानेवाला होता है। संक्षिप्त मे कहा जाये, तो पुराना मक्खन अहितकर होता है। उसका सेवन नही करना चाहिए। परंतु आजकी स्थिती क्या है यह आप सभी लोग जानते ही हो। 99% लोग आज पुराना मक्खन ही खाते है और अपेक्षाए ताजे मक्खन से मिलनेवाले फायदों की रखते है। ऊपर से पुराना मक्खन खाकर जो विकृतियाँ शरीर मे उत्पन्न होती है वह मक्खन के माथे चढ़ाकर उसे बदनाम करते है कि मैंने मक्खन खाया तो मेरा वजन बढ़ा, फलाना हुआ और ढिकना हुआ। जब कि आयुर्वेद ने इस बारे में हजारों वर्ष पूर्व ही स्पष्ट निर्णय देते हुए कहा है कि यह दुष्परिणाम पुराना मक्खन खाने की वजह से होते है। एकदम ताजा मक्खन तो लघु होता है मतलब सुलभता से पच जाता है। ताजा मक्खन मेधावर्धक भी होता है मतलब बुद्धि की धारणक्षमता बढ़ाता है। परंतु ताजा ताजा बनाने के बाद जैसे जैसे समय बीतता जाता है, वही मक्खन बाद में पाचन में भारी होता है एवम उपरोक्त सभी खराब गुणधर्म उसमे कालप्रकर्ष की वजह उत्पन्न हो जाते है और आजकल तो यह परंपरा है कि ताज मक्खन बनाने के बाद उसे खराब न हो इसलिए फ्रिज में रख देते है। फ्रिज में रखने से वह पुराना तो होता ही रहता है, ऊपर से उसमे आत्यंतिक शीत एवं गुरु गुण समाहित हो जाता है। इसलिए वह पचने में बहोत भारी हो जाता है। पाचनशक्ति को मंद कर देता है और अगर यही क्रम रोज का रहा तो फिर धीमे धीमे पाचनतंत्र की अलग अलग व्याधियों का शरीर मे प्रादुर्भाव होने लगता है। इतना अपचार शायद कम पड़ता हो तो कुछ लोग ऐसे मक्खन के साथ ठंडा पानी या कार्बोनेटेड सॉफ्ट ड्रिंक भी लेते है, जो साक्षात सर्वनाश को आमंत्रण ही होता है।

मार्जारीन (Margarine) गुणधर्मों के बारे में असली मक्खन से कोसों दूर होता है। मार्जारीन सिर्फ दिखता ही असली मक्खन जैसा होता है। इसलिए तो इसे इमीटेशन बटर कहा जाता है। मार्जारीन यह वनस्पति तैल तथा मरे हुए प्राणियों का वसा और अन्य कई रसायन मिलाकर बनाया जाता है। वनस्पति तेलों पर हैड्रोजिनेशन जैसी रासायनिक प्रक्रिया करके उसे फैट में बदल दिया जाता है। ऐसे मार्जारीन में प्रभूत मात्रा में सैचुरेटेड तथा ट्रांस फैट्स पाए जाते है जो मनुष्य शरीर मे कोलेस्ट्रॉल तथा अन्य विकृत लिपिड्स बढ़ाते है। यही विकृत लिपिड्स बाद में हृदय की रक्तवाहिनियों में संचित होकर उसे अवरुद्ध कर देते है। इसके सिवा मार्जारीन शरीर मे फ्री रेडिकल्स भी उत्पन्न करता है जो शरीर उपयोगी रासायनिक क्रियाओं में बाधक बनकर शरीर को हानि पहुँचाते है। मार्जारीन शरीर की व्याधिप्रतिकार शक्ति कम करता है। यह माताओं के दूध की गुणवत्ता को कम करता है। रक्तस्थित शर्करा पर इन्सुलिन की क्रिया को धीमा कर देता है। मतलब आज जो लोग बारबार बीमार पड़ते है या डायबिटीज जैसे व्याधि धीरे धीरे अपना साम्राज्य बढ़ाते जा रहे है, इसके पीछे मार्जारीन जैसे अनेक कारणों का हाथ होता है यह ध्यान रखे।

मार्जारीन का रासायनिक स्वरूप अगर आप जानोगे तो आपको पता चलेगा कि मार्जारीन यह प्लास्टिक बनने से सिर्फ एक मॉलिक्यूल ही दूर होता है मतलब मार्जारीन और प्लास्टिक एक दूसरे के चचेरे भाई समझो तो भी चलेगा। इतना ही नही मार्जारीन और दीवार को दिया जानेवाला जो रंग (paint) होता है उन दोनों के 27 घटकद्रव्य एक जैसे होते है। इसलिए मार्जारीन खुला छोड़ने पर भी जल्दी खराब नही होता, ना ही उसमे कीड़े पड़ते है। अब इस बात पर ध्यान दीजिए कि खुला छोड़ने पर भी जिसे कीड़े भी नही खाते, उसे आदमी खाता है। मतलब बाहर मक्खन के नाम पर आप क्या खा रहे हो और आपके शरीर के क्या हाल-बेहाल कर रहे हो वो समझ मे आ जायेगा। पर अब आपके मन मे प्रश्न उत्पन्न होगा कि हम तो मार्जारीन खाते ही नही? हम तो ओरिजिनल मक्खन ही खाते है। तो आपका सोचना गलत है भी और नही भी। वैसे हम भारतीय मार्जारीन को कभी भी पसंद नही करेंगे यह बात जितनी सत्य है, उतनी यह कि घर से बाहर जाने के बाद हमे खाना सस्ता चाहिए होता है और उस खाने के साथ बटर रोटी भी चाहिए होती है। हॉटेलवाला आपकी बटर रोटी इस मार्जारीन से एडजस्ट करता है और आप भी रोटी पर बटर डाला है यह समझकर बड़े चाव से खाते हो। यही मार्जारीन सभी बेकरी प्रोडक्ट्स में भी उपयोग किया जाता है। केक की आइसिंग के लिए तथा पेस्ट्रीज में भी इसी मार्जारीन का उपयोग किया जाता है। मतलब घर मे भले आप असली मक्खन खाते होंगे, बाहर तो असली के नामपर आपको मार्जारीन के रूप में नकली मक्खन ही परोसा जाता है और आज मनुष्य शरीर जो कैंसर जैसे अनेक व्याधियों का घर बना हुआ है उनके अनेक कारणों में से यह एक कारण है। इसलिए मक्खन जैसे खाद्यवस्तुओं के बारे में भी सतर्क रहें और स्वस्थ रहे। घर का ही बनाया हुआ एवम ताजा ताजा ही मक्खन खाएं। नमक मिलाया हुआ और फ्रिज में रखा हुआ बहोत पुराना नही।

अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत