Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 18 Oct 2018 Views : 558
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दही : रोज खाना चाहिए की नहीं ?

दही क्या होता है? कैसा बनता है? इसके बारे मे सभी लोगों को प्राथमिक स्तर की जानकारी तो होती ही है। इसलिए उसके बारे मे यहाँ चर्चा करना समय व्यर्थ करने जैसा है।

दही को सब जानते तो है पर इसके गुणधर्मों के बारे में लोगों के बीच बहोत गलत संकल्पनाएँ है, जिन्हें दूर करके उसके शास्त्रोक्त गुणधर्म जनमानस तक पहुँचाना इस लेखा का मुख्य उद्देश्य है।

दही सभी को प्रिय होता है। पृथ्वी पर कोई विरला ही व्यक्ति ऐसा मिलेगा जिसे दही पसंद नही। इसलिए 'खानेवालों' को खाने का बहाना चाहिए इस कहावत के अनुसार दहीप्रिय लोग इसके अनेकानेक स्वास्थ्यप्रद परिणाम कही न कही से ढूँढकर निकालते है और दही खाना चालू ही रखते है। कुछ रुग्णों का दहिसेवन बंद करने के बाद, वो दही के सेवनपक्ष मे इतनी दलीले देते है कि मानो आपने उसका दही नही बल्कि ऑक्सीजन ही बंद किया हो।

वास्तविक रूप मे दही सच मे एक अच्छा आहारद्रव्य है। आयुर्वेद मे इसे आहाररूचि बढ़ानेवाला कहा है। मतलब स्वादहीन आहार हो तो भी अगर दही साथ मे लिया जाय तो आहार की रुचि बढती है।

परंतु दही सेवन करते वक्त आयुर्वेदोक्त कुछ निम्नलिखीत नियमों को ध्यान मे रखना बहोत जरूरी है।

1) दही यह नित्यसेवन की आहार वस्तु नही है। आयुर्वेद के ऋषि आचार्य चरक ने इस विषय मे अत्यंत स्पष्ट रूप से अपने विचारों को सभी के समक्ष रखा है। इसलिए दही का नित्यसेवन वर्जित करे। 10-15 दिनों मे एक बार दही का सेवन किया जा सकता है। परंतु वो भी अन्य नियमों के आधीन। जैसे दही का सेवन प्रातः काल मे ही करे। सायंकाल के पश्चात न करे। रात को दही सेवन करने से शरीर के धातुओं में अत्यधिक अभिष्यंद उत्पन्न होता है। इसलिए ही रात मे दही का सेवन करने वाले लोगों मे अधिकांशतः थायराईड के विकार, केशविकार, नेत्रविकार तथा विविध प्रकार के त्वचाविकार तथा मधुमेह जैसे व्याधि अधिकांशतः देखने मे आते है।

2) दही जब भी खाये अकेला न खाये। दही मे घी शक्कर मिलाकर ही खाये। शहद मिलाकर, देसी आँवले की पावडर मिलाकर भी खाया जा सकता है। दही मे मूँग की दाल मिश्रित करके भी खाई जा सकती है। मतलब जितना दही है, उतने या उससे ज्यादा प्रमाण मे सादी छौंक दी हुई मूँग की दाल मिश्रित करके भी खाई जा सकती है।

3) दही गरम करके सेवन न करे। इसलिए आजकल के आधुनिक पाकशास्त्र मे सब्जियों मे दही डालकर सब्जी बनाने ही हो, तो सब्जी ठण्डी होने के बाद उसमे मिलाकर खाया जा सकता है। परंतु यह पद्धती दोषपूर्ण ही है। इसलिए संभव हो तब तक इसका अनुसरण नही करना चाहिए।

4) दही बनाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का ही उपयोग श्रेष्ठ रहता है। आदर्शरूप प्रत्येक वक्त नया मटका लेना अच्छा होता है। परंतु अगर यह संभव नही हो, तो मटके को अंतर्बाह्य गरम पानी से धोकर गैस या चूल्हे पर गरम करना चाहिए अथवा भट्टी मे सेकना चाहिए। उसके बाद उसका उपयोग करना चाहिए। वैसे स्टील के बर्तन मे दही लगाने मे भी कोई समस्या करना चाहिए। दोनो बर्तनों के दही मे भेद केवल इतना होता है की मिट्टी के बर्तन मे लगाया हुआ दही कम धातू प्रदूषक होता है।

6) शरद ऋतु - मध्य सितंबर से मध्य नोवेंबर

  ग्रीष्म ऋतु - अप्रैल मे 15 जून तक का काल

  वसंत ऋतु - फेब्रुवरी अंत से सम्पूर्ण मार्च

इस समय के दरम्यान दही का सेवन नही करना चाहिए।

7) रक्तविकार पित्तविकार तथा कफविकारों मे दही का सेवन नही करना चाहिए अन्यथा यह व्यधियाँ वृद्धि को प्राप्त होती है।

8) दही जमने के लिए औसतन 7 से 8 घण्टे लगते है, तो इस समय से पहले दही जमकर तैयार हो जाता है और ठण्डी ज्यादा है तो इस औसतन समय भी लगता है। भोजनालयों में जहाँ ज्यादा लोग भोजन करने के लिए आते है, वहाँ दही जमाने के लिए इतना समय नही रहता इसलिए कई जगह, अधजमा दही ही खाने के लिए परोस देते है। अधजमा दही भयंकर दोषकारक होता है। यह गला तो पकड ही लेता है, उपर से कई त्वचारोगों को मुफ्त भी दे के जाता है। हॉटेल में मिलनेवाला दही कितने समय तक जमाया हुआ है, यह न तो आप पूछ सकते हो, न ही वेटर को पता होता है। इसलिए बाहर का दही वर्ज्य करना ही श्रेयस्कर होता है।

इन उपरोक्त नियमों का पालन करते हुए खाया हुआ दही कभी अपायकरक नही होता अपितु स्वास्थ्य की वृद्धि ही करता है।

दही के अन्य शास्त्रोक्त गुणधर्म आगे लिखे है।

1) दही भूख बढ़ाता है। परंतु पाचनशक्ति नही बढ़ाता। इसलिए अगर किसी को सिर्फ भूख न लगने की समस्या है तो उसे निश्चित रूप में दही सेवन करने की सलाह दी जा सकती है। परंतु इसका यह अर्थ नही है की आपको थोडी भी भूख कम लगना शुरू हो और आप दही खाना शुरू करे। दही कुछ विशिष्ट अवस्थाओं मे ही क्षुधाशक्ति बढाने का कार्य करता है। इसलिए यहाँ वैद्यराज की सलाह - सूचना अत्यावश्यक है।

2) दही वीर्यवर्धक है। वीर्य की मात्रा बढाने मे उपयोगी है। परंतु दही के इस गुण की उपलब्धि भी उसके नियमानुसार सेवन से ही प्राप्त होती है।

3) दही शरीर मे स्निग्धता उत्पन्न करनेवाला होता है। साथ मे यह स्निग्धता को बनाए भी रखता है। इसलिए वात प्रकृति वाले लोगो को तथा राजस्थान जैसे प्रदेशों मे जहाँ मरुभूमि का वास्तव्य है, दही का अल्पमात्रा मे सेवन आवश्यक है। परंतु नित्यसेवन आवश्यक नही, यह ध्यान रहे। 5-6 दिनों मे एक बार और वो भी अल्प मात्रा मे ही। क्योंकि नियमित और अत्याधिक मात्रा में दही शारीर धातुओं में क्लेदोत्पति करता है और यह क्लेद अनंतर काल में अनेक रोगों को उत्पादक कारण बन जाता है।

4) पक्व (mature) दही मनुष्य बल की वृद्धि कराता है। परंतु दही का यह कार्य निरामावस्था मे ही संभव है। दही योग्य काल, योग्य मात्रा एवं अनुपान के साथ सेवन किया जाए, तो यह धातुओं का तर्पण करता है।

5) दही उत्तम वातघ्न आहार द्रव्य है ऐसा शास्त्रवचन है परंतु सत्य यह है कि वर्तमान मे इसके विपरीत गुणों की उपलब्धी देखी जाती है। क्योंकि व्यवहार मे जब भी कोई व्यक्ति दही का सेवन करता है तो उसमे पहले से उपस्थित वातव्याधी बढते हुए देखे जाते है अथवा वारंवार दही खानेवाले लोगों को संधिवात, आमवात जैसे वातव्याधी जल्दी उत्पन्न होते देखे जाते है।

6) दही मांसधातु को बढनेवाला होता है। इसलिए पतले लोगों मे वजन बढाने के लिए 7 दिन मे एक बाद दही सेवन की सलाह दी जा सकती है। क्योंकि नित्य दही सेवन का आयुर्वेद निषेध करता है।

7) दही मंगलमय है। इसलिए किसी भी शुभकार्य की शुरवात दही शक्कर या दही भात सेवन करके की जाती है। दही का दर्शन तथा स्पर्श भी शुभ माना गया है। हालाँकी इसके पीछे की कारणमीमांसा अभी तक कोई बता नही पाया है, परंतु यह सत्य है। परंतु यह सेवन भी अल्प मात्रा मे प्रसाद के जैसा होना चाहिए, न की आहार के जैसा यह ध्यान रहे।

8) दही के गुणधर्मो को देखते हुए भिन्न भिन्न व्याधियों मे आचार्यों ने उसे उपयुक्त कहा है। परंतु यहा एक बात सदैव ध्यान मे रखनी चाहिए की सिर्फ किताब, कोई आरोग्यपत्रिका या समाचार पत्रों मे पढकर दही का उन व्याधियों मे उपयोग नही करना चाहिए। प्रत्येक व्याधी मे कई अवस्थाये अथवा प्रकार होते है और व्याधि एक होने के बावजूद भी भिन्न भिन्न अवस्थामे भिन्न भिन्न चिकित्सा प्रयुक्त होती है। इसलिए अतिसार, विषमज्वर, मूत्रकष्टता जैसे व्याधियों मे दही के उपयोगों की आयुर्वेद मे भले ही प्रशंसा की गई हो, लेकिन बिना वैद्यजी के सलाह, दही का इन व्याधियों मे उपयोग नही करना चाहिए। अधिकांशतः तो यही देखा गया है की उपरोक्त व्याधियों मे दही इतना प्रशंसित होने के बावजूद भी उनके लक्षणों मे दही सेवनोत्तर बढोतरी ही होते देखी गई है। इसका एक ही कारण होता है व्याधिअवस्था तथा उस अवस्था मे सक्रिय दोष का ज्ञान न होना। पूर्णपक्व दही वातघ्न होता है। इसलिए अतिसार, विषज्वर, मूत्रकष्टता जैसे व्याधियों मे अगर शुद्ध वात की सहभागिता है, तो ही दहिसेवन इन व्याधियों मे पित्त - कफ दोषों को बढ़ाकर व्याधिवृद्धि मे सहायक ही होता देखा गया है।

अतिसार और दही का समीकरण तो जनमानस मे इतना प्रिय है की लोग दो-चार बार ही पतले शौच होने के बाद तुरंत दही भात खाना शुरू कर देते है। फिर भी आजतक इससे किसी को ठीक होते देखा नही गया है। उलटा दही की वजह से कुछ रुग्णों मे रक्तप्रवृत्ति जरूर देखी गई है। इसलिए बिना वैद्यजी से परामर्श अतिसारादी रोगों में दही का उपयोग करना ठीक नही होता।

खट्टा दही और मीठा दही

जब किसी रुग्ण को परहेज में दही खाने के लिए मना किया जाता है तो वो मीठा दही खाया तो चलेगा क्या? ऐसा प्रश्न करता है। वस्तुरूप में देखा जाए तो दोनों के गुणधर्मों में निश्चित अंतर है परंतु यह अंतर कोई बहोत ज्यादा नही है। खट्टा दही ज्यादा पित्तकारक होता है, तो मीठा दही कम पित्तकारक होता है। बाकी अभिष्यंदी गुण तो खट्टे और मीठे दोनो में समानरूप से रहता ही है। परंतु यह बात ध्यान में रखे कि शास्त्र में खट्टा दही और मीठा दही ऐसा कोई फर्क नही किया गया है। इसलिए दही चाहे मीठा हो या खट्टा उसके गुणधर्म कमोबेश एक जैसे ही होते है। अतःएव परहेज करते वक्त उसका पूर्णरूपेण त्याग करना ही उचित रहता है। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत