Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 06 Sep 2018 Views : 355
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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रुग्ण का स्वभाव कैसा होना चाहिए?

कुछ रुग्ण ऐसे होते है की उनकी तकलीफ एकदम छोटी मतलब सुखसाध्य, सहजसाध्य (easily curable) होती है। फिर भी कई दिनो, महीनों या वर्षो से वह तकलीफ 'जैसे थे' बनी हुई होती है। ठीक ही नही होती। ऐसे रुग्ण जब डॉक्टर के पास वैद्यकीय सलाह के लिए आते है, तो डॉक्टर भी सोच मे पड जाते है की रोग छोटा होने के बावजूद भी अभी तक ठीक क्यो नही हुआ? परंतु इस प्रश्न का उत्तर भी उन्हे रुग्ण की चिकित्सा करने के 2 सप्ताह के भीतर ही मिल जाता है। व्याधी साध्य होने के बावजूद भी रोगी ठीक नही होने का कारण होता है - रोगी का औषध लेने मे आनाकानी करना, नखरे करना। जैसे की मुझे काढा अच्छा नही लगता, मै इतनी ज्यादा गोलियाँ कैसे ले पाऊँगा? या फिर मे इतना कडवा चूर्ण नही ले सकता/सकती वगैरे वगैरे। उपर से कुछ रुग्ण अपने रोग के बारे मे इंटरनेट पर पढकर आधे डॉक्टर तो वैसे ही हो जाते है। इसलिए डॉक्टर द्वारा दी हुई औषधि की मात्रा मे अपने मन से ही बदलाव करते है या फिर निर्देशित (prescribed) औषधियों की जगह दूसरी ही औषधियाँ लेंगे या फिर औषधि लेने के समय मे अथवा मात्रा (dose) में बदलाव करेंगे ऐसे काम करते है। कुछ रुग्ण इतने चंचल मन के होते है की एक डॉक्टर पर तो उनका विश्वास ही नही होता। बारबार डॉक्टर बदलते रहते है और एक डॉक्टर द्वारा दी हुई औषधि दूसरे डॉक्टर से, और दूसरे डॉक्टर द्वारा दी हुई औषधि तिसरे डॉक्टर से सत्यापित (verify) करने के बाद ही उनको मनःशांति मिलती है। डॉक्टर द्वारा निर्देशित औषध योजना (Treatment regimen) को भी वो पूरा नही करते। इसलिए उन्हे कभी भी किसी भी डॉक्टर से अच्छा परिणाम नही मिलता, फिर वो डॉक्टर भले स्वतः भगवान धन्वंतरी ही क्यों न हो। फिर 'मैंने तो आयुर्वेद की बहोत चिकित्सा ली, पर मुझे तो कोई फायदा हुआ ही नही' ऐसा आयुर्वेद के नाम से चारो दिशाओ मे शंखनाद करते फिरते है। इसलिए आयुर्वेद के आद्य ऋषि आचार्य चरक ने रोग की साध्यासाध्यता जानने के लिए पहले रोगी के स्वभाव के गुण-दोष जानना जरूरी होता है ऐसा प्रतिपादित किया है। आचार्य चरक ने रोगी के चार आदर्श गुणों का उल्लेख किया है। यह सद्गुण जिस रोगी मे देखे जाते है, उसका रोग कभी भी असाध्य नही होता।

रोगी के यह आयुर्वेदोक्त सद्गुण निम्नलिखित है।

1) स्मृति

2) निर्देशकरिता

3) अभीरुता

4) ज्ञापकत्वम

1) स्मृति - स्मृति यह सद्गुण व्याधी की साध्यासाध्यता कैसे निश्चित करता है?

जब भी कोई रोगी किसी डॉक्टर के पास जाता है, तो डॉक्टर उसे उसके व्याधी का पूरा इतिहास पूँछते है की यह लक्षण कब से है। सबसे पहले या लक्षण कब उत्पन्न हुआ? इस लक्षण के साथ अन्य कोई सहयोगी लक्षण था या नही? लक्षणों का उत्पत्तिक्रम कैसे था मतलब सबसे पहले कौनसा लक्षण कहाँ उत्पन्न हुआ? लक्षणों की तीव्रता कितनी थी। यह लक्षण उत्पन्न होने से पहले आप कहाँ (किस जगह, प्रदेश में) थे, क्या खाया था? यह सब पूछा जाता है। रोगनिर्माण का यह इतिहास ही डॉक्टर को चिकित्सा निश्चित करने की दिशा प्रदान करता है और यही बाते अगर रोगी भूलता है, तो फिर डॉक्टर चिकित्सा किस आधार पर तय करे? क्योंकि कई बार उत्पन्न हुआ लक्षण एक रहता है, पर उसके उत्पत्ति मे अनेक कारणों का सहयोग रहता है। मतलब लक्षण भले ही एक हो, पर उसके कारणों में विविधता रहती है और जब तक एक निश्चित कारण का पता नही चलता, तब तक उसके कारण का निवारण करनेवाली चिकित्सा प्रयुक्त नही की जा सकती और यह संपूर्ण घटनाक्रम रोगी की स्मृति पर निर्भर करता है। इसलिए रोगी की स्मृति उत्तम होनी चाहिए। कई बार रोगी इतिहास कथन मे भी आलस करते है और फिर डॉक्टर से अचूक चिकित्सा की अपेक्षा करते है, जो सर्वतः गलत है।

2) निर्देशकारिता - निर्देशकारिता का मतलब चिकित्सक के आदेश को माननेवाला एवं पालने वाला। दुर्दैववशात यह सद्गुण आज सिर्फ 2% रोगियों मे देखने का मिलता है। क्योंकि बाकी के 98% रोगी ये अपने आपमे 50% डॉक्टर स्वतः होते है।

डॉक्टर जब औषधि लिख देते है तो उसके पीछे उनकी एक वैचारिक बैठक होती है। इसलिए डॉक्टर औषधि जिस मात्रा, काल तथा अनुपान के साथ लेने का निर्देश देते है, उतने ही मात्राकालादि मे औषधि लेनी चाहिए फिर भले ही औषधि आपको लेने में थोड़ी दिक्कत ही क्यों न आए, औषधि आपको ऑफिस मे ही क्यों न ले जाना पडे। परंतु ज्यादातर रुग्ण ऐसा नही करते क्योंकि जब डॉक्टर रोगी को औषधि समझा रहे होते है उस वक्त या तो वे उधर ध्यान नही देते या फिर दिया हुआ औषधि निर्देशपत्र (prescription) ठीक से पढते भी नही और फिर मन मे आये, उतने समय और उतनी बार गलत तरीके से औषधि का सेवन करते है।

जो परहेज करने के लिए बोला जाता है, जिव्हालौल्यवश उसका भी पूरा पालन नही करते और फिर सकारात्मक परिणाम नही मिलने पर डॉक्टर और आयुर्वेद दोनो के नाम से शंखनाद करते है। इसलिए निर्देशकरिता यह सद्गुण रुग्ण मे होना अत्यावश्यक है। अगर यह सद्गुण रुग्ण मे है, तो कितना भी भयंकर व्याधी क्यों न हो, या तो पूरा ठीक होता है अथवा असाध्य होने के बावजूद भी पूर्ण नियंत्रण मे तो रहता ही है।

3) अभीरुता - भीरु यह संस्कृत शब्द है। इसका अर्थ होता है - डरपोक अभीरु मतलब जो डरनेवाला नही हो अर्थात जो मन से बलवान हो। चिकित्सा शास्त्र चाहे एलोपैथी हो या आयुर्वेद, इनमे उपलब्ध सभी औषधियाँ चॉकलेट जैसी मीठी एवं स्वादिष्ट नही होती। विशेषतः आयुर्वेद की तो अधिकतम औषधियाँ स्वाद मे भयंकर कडवी, अप्रिय स्वाद तथा गंधवाली होती है।अगर रोगी का मन बलवान है, तो उसे ऎसी औषधियाँ लेने का डर होता नही। सहजता से सेवन कर लेता है।

आयुर्वेद मे रक्तमोक्षण (अशुद्ध रक्त निकालने की प्रक्रिया) करने के लिए जलौका(जोंक, leech) का उपयोग किया जाता है। सिरावेध (venesection) किया जाता है तथा तुम्बी भी लगाई जाती। इसके सिवा तीव्र शूल के सद्यशमनार्थ अग्निकर्म भी किया जाता है। परंतु यह तभी संभव है, जब रुग्ण निडर हो, निर्भय हो अन्यथा साधारण उपायों से उपरोक्त व्याधियों की चिकित्सा संभव नही होती। इसलिए रुग्ण का मनोबल अच्छा होना भी एक उसका सद्गुण है, जो उसे जल्दी ठीक करने में सहायक होता है।

4) ज्ञापकत्वम - ज्ञापकत्वम अर्थात रोग संबंधी सभी बातों को ठीक ठीक बताने की क्षमता रखने वाला।

प्रत्येक व्याधी की अपनी अवस्थाये रहती है। प्रथम अवस्था दूसरी अवस्था से संबंधित होती है। इसलिए व्याधि निर्धारण  (Diagnosis of the disease) प्रक्रिया में पहली अवस्था का ज्ञान भी आवश्यक होता है। यह तभी संभव है, जब रोगी लक्षण तथा अवस्थाओं को ठीक तरह से वैद्य के सामने कथन करे। नही तो आजकल के रोगियों का इतना सब क्रमवार बताना भी जानपर आता है। वो डॉक्टर के सामने 3-4 किलो वजन की बडी बडी फाइल रख देते है और अपेक्षा करते है कि डॉक्टर खुद सब फ़ाइल खोलके देखे और अगर बिना फ़ाइल देखे कुछ लक्षणों के बारे में पूछा जाए तो उन फाइल मे देखने के लिए कहते है। मतलब रुग्ण अपनी ही चिकित्सा के लिए इतना उदासीन रहता है कि वह डॉक्टर के सामने अपने रोग का प्रस्तुतिकरण भी ठीक से नही कर सकता, उपर से डॉक्टर से अपेक्षाएं इतनी की डॉक्टर उसका रोग रातोंरात ठीक कर दे। यह कैसे संभव है? इसलिए आयुर्वेद के आचार्यो ने आज से 2000 वर्ष पूर्व ही रोगी के इन सद्गुणों का भी वर्णन किया है, जो रोगचिकित्सा का एक अत्यावश्यक अंग है।

1) साध्य रोग अल्प समय मे ठीक हो

2) रोग कष्टसाध्य है तो सहजसाध्य होने के लिए

3) रोग असाध्य हो तो रोग आगे न बढे एवं नियंत्रण में रहे

इन सब के लिए रोगी मे इन चारों गुणों की उपस्थिती अनिवार्य है, अन्यथा शीध्र स्वास्थकामना का रोगी का विचार यह स्वप्नवत ही रहेगा। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि रोग उत्पन्न होनेपर उसका निवारण करने के लिए उपरोक्त 4 सद्गुणों का पालन करे ताकि वह शीघ्रातिशीघ्र स्वाथ्यलाभ करे। अस्तु। शुभम भवतु।

 

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