Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 23 Aug 2018 Views : 570
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
23 Aug 2018 Views : 570

किडनी फेल्युअर और आयुर्वेद

कई वर्ष पहले का और आज का सामाजिक चित्र देखोगे, तो आपको एक बात स्पष्ट रूप से पता चलेगी की सन 2000 तक किडनी फेल्युअर के रोगी सफेद शेर जैसे दुर्लभ थे और आज किडनी फेल्युअर का रोगी देखना एकदम सामान्य सी बात हो गई है। आज हर 100 लोगो में से 3 लोगो को किडनी फेल्युअर होता है इतनी द्रुतगति से ये व्याधी अपनी व्याप्ति बढ़ा चूँका है।

तो पिछले 18 सालों मे ऐसा क्या हुआ जो आज किडनी फेल्युअर के रोगियों की संख्या घर घर देखने को मिलती है?

इसके मुख्यतः दो कारण बताये जा सकते है|

1) दीर्घकाल बना रहनेवाला ब्लड प्रेशर (Blood Pressure)

2) वेदनाशामक गोलियों (Painkiller tablets) का अत्याधिक सेवन

उपरोक्त कारणों की वजह से धीमे धीमे रोगी की किडनी पर दुष्परिणाम होना शुरू हो जाता है। शुरवाती दिनों में यह दुष्परिणाम अल्प प्रमाण में होते है इसलिए रोगी के शरीर पर इन दुष्परिणामों के कोई भी लक्षण सहजता से दृग्गोचर नही होते। परंतु कुछ वर्षो के पश्चात जब अचानक चेहरे या पैरो पर सूजन आ जाती है या फिर अचानक से रक्त (hemoglobin) कम हो जाता है तब खून की जाँच करने से पता चलता है कि उस व्यक्ति के किडनी की कार्यक्षमता भयावह रूप से कम हो गई है, तब कही वह व्यक्ति उसकी चिकित्सा के लिए कुछ हाथपैर मारना शुरू कर देता है। पर तब तक थोडी देरी हो ही चूँकी होती है। उसमे भी लोग चिकित्सा के लिए पहले एलोपैथी को प्राधान्य देते है। एलोपैथी मे तो किडनी की कार्यक्षमता बढाने के लिए कोई आभ्यंतर औषधी नही है। सिर्फ डायलिसीस जैसी एक यांत्रिक प्रक्रिया है जो कई हद तक किडनी का कार्यभार संभालकर रोगी को कुछ वर्षों तक जीवंत रखती है। परंतु डायलिसीस थोडी महार्घ प्रक्रिया है और उसके भी अपने कुछ दुष्परिणाम है। डायलिसीस की प्रक्रिया व्याधी की तीव्रता के अनुसार हप्ते मे 1, 2 या 3 दिन करनी होती है, जो डॉक्टर रोगी की परीक्षा करने के बाद ही निश्चित करते है। एक बार डायलिसिस करने के लिए कमसे कम 4 घण्टे का समय तो लगता है और एक बार डायलिसिस करने के लिए कम से कम रु. 3000 की आवश्यकता तो होती ही है, जिसमे डायलिसिस करने के साथ साथ आने - जाने का व्यय (expenditure) भी सम्मिलित है। आजकल कई सारी धर्मार्थ संस्थाए गरीब रुग्णों के इस खर्च मे हाथ बटाते है, इसलिए डायलिसिस का वर्तमान खर्च रु. 500 से 1500 के उपर नही जाता। परंतु यह छूट सिर्फ यांत्रिक प्रक्रिया के भारवहन का एक भाग होती है। बाहर से कुछ औषधि लानी हो तो रुग्ण को वो अपने ही खर्च से लानी पडती है। यह सब खर्च तो एक समय का है। सप्ताह में 3 बार करने वाले इतना भी खर्च कैसे और कबतक उठा पायेंगे? इन आर्थिक कारणों की वजह से लोग डायलिसिस का विकल्प ढूँढना शुरू कर देते है और तब ही सभी को आयुर्वेद की याद आती है। परंतु यह याद आते आते तो एक वर्ष निकल ही जाता है और तब तक रोग साध्य से कष्टसाध्य अवस्था मे पहुँच जाता है। मतलब वृक्कविकर का रोगी एक वैद्य के पास, जब पहुँचता है, तब तक रोग या तो कष्टसाध्य अवस्था मे पहुँचा होता है या असाध्य हो जाता है और ऐसी अवस्था मे लोग आयुर्वेद से किडनी फेल्युअर की मूलग्राही चिकित्सा की अपेक्षा रखते है, जो सर्वतः गलत है।

कभी कभी रोगी विश्वास की वजह से पहले एलोपैथी मे जाने की बजाए आयुर्वेद को ही पसंद करता है। पर वो भी अपने शर्तो पर मतलब रोगी को अपने हिसाब से चिकित्सा चाहिए होती है। आयुर्वेद के अनुसार वृक्कविकारों की अगर मूलग्राही चिकित्सा करनी है, तो व्याधि की अवस्था तथा रोगी का बल देखकर पंचकर्म करना बहोत जरूरी होता है और पंचकर्म के लिए हॉस्पिटल में एडमिट होकर समय देना भी बहोत जरूरी होता है। पर चूँकी किडनी फेल्युअर यह कोई विकलांग बनाने वाला व्याधि (disabling disease) नही है, धीरे धीरे आगे बढता है। रोगी भी बाहर से स्वस्थ दिखाई देता है। जो भी विकृति पता चलती है वो सिर्फ कागज (Pathological reports) पर ही होती है। इसलिए रोगी इसकी चिकित्सा को लेकर इतना गंभीर नही होता। युद्धस्तर पर इसकी चिकित्सा करने की कोई आवश्यकता इसे प्रतीत नही होती है। अतःएव कोई दुकान संभालकर चिकित्सा कराना चाहता है, तो कोई नोकरी संभालकर। रोगी अगर महिला है तो समस्या और भी बिकट हो जाती है। क्योंकि उस माता-बहन के सिवा उसका परिवार पंगु हो जाता है। इसलिए वो भी एडमिट नही होना चाहती। संक्षेप में कहे तो कोई भी किडनी फेल्युअर की चिकित्सा के लिए एडमिट रहकर चिकित्सा कराना नही चाहता परंतु शास्त्र के अनुसार आवश्यकता तो यही होती है की रोगी एडमिट होकर ही चिकित्सा करवाये क्योंकि व्याधि होता ही इतना बलवान है। पर चूँकी सबकी अपनी अपनी अलग समस्याए होती है, इसलिए कोई एडमिट नही होता और घर पर (OPD level) ही इसकी चिकित्सा करवाने का आग्रह करते है। इसलिए ऊपर ऊपर रोग काबू मे रहते हुए भी अंदर से आगे बढता ही रहता होता है। अतः एक समय ऐसा आता है की आभ्यंतर औषधि शुरू होते हुए भी रोग अपनी अंतिम अवस्था मे पहुँचकर असाध्य हो जाता है।

आयुर्वेद चिकित्सा से किडनी फेल्युअर (अगर क्रिएटिनिन 10 या उससे कम हो तो) पर निश्चित रूप से नियंत्रण किया जा सकता है। परंतु रोगी की व्यवसाय/नौकरी के प्रति भौतिक आसक्ति अथवा आर्थिक समस्याए तथा रोग का जीर्ण स्वभाव (Chronic nature) उसे पंचकर्म करवाने से रोकता है और चिकित्सा के प्रति यही उदासीनता रोग की दारुणता (deteriorating) का कारण बनता है। यही कारण है कि आयुर्वेद की सिर्फ शमन चिकित्सा से किडनी फेल्युअर का रोगी कभी ठीक नही होता। शोधन चिकित्सा (पंचकर्म) अत्यावश्यक होती है। इसलिए अगर आप किडनी फेल्युअर की यशस्वी चिकित्सा आयुर्वेद से करवाना चाहते हो तो वैद्यराज द्वारा सूचित पंचकर्म जरूर करवा ले और रोगमुक्तवत होकर स्वस्थ रहे। रोगमुक्तवत अर्थात रोगमुक्त जैसा, क्योंकि किडनी फेल्युअर यह एक याप्य रोग है। जबतक औषधि सेवन चालू है तब तक शरीर स्वस्थ रहता है। औषधि बंद करते से ही कुछ दिनों के बाद रोग के लक्षणों का पुनः आविर्भाव होने लगता है। इसका कारण वृक्कों की स्थायी दुर्बलता होती है, जिसके अनेक कारण है।

अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत