Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 26 Jul 2018 Views : 696
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नीम के प्रचलित उपायों की सत्यता

संपूर्ण भारतवर्ष मे संख्या मे सबसे बडा अगर कोई पेड होगा तो वह शायद नीम का ही पेड होगा। बहोत विरल स्थान ही भारत मे ऐसे होंगे, जहा नीम का पेड न हो। नीम के पेड़ से भारत का बच्चा - बच्चा परिचीत है। इसलिए इसके ज्यादा परिचय की आवश्यकता नही।

नीम के साधारणतः 2 प्रकार होते है। मीठा नीम और कडवा नीम। मीठे नीम के पत्ते सब्जी तथा अन्य कई व्यंजनों मे स्वाद बढाने के लिए उपयोग मे लाए जाते है। इसलिए इसके परिचय की भी आवश्यकता नही है।

कड़वा नीम अर्थात नीम यह शुद्ध भारतीय वनस्पती है। मतलब यह कोई बाहर से आयातित वनस्पति नही है। सामान्य जनता परंपरागत तरीके से नीम के विविध औषधीय उपयोगों से परिचित है। परंतु कई बार यह प्रचार-प्रसार इतना अति हो जाता है की लोग बिना सोचे समझे उस-उस औषधि का वैद्यजी कि सलाह के बिना ही उस औषधि का सेवन करना शुरू कर देते है। यही बात नीम जैसे औषधि वनस्पति के साथ भी हुई। लोगो ने बिना सोचे समझे नीम का अलग अलग प्रकार से बाह्याभ्यंतर मार्ग से नीम का सेवन करना शुरू किया। निरोगी होने की और निरोगी रहने की कुंजी मतलब नीम ऐसा लोग समझ बैठे है।

नीम के बारे में ऐसा चित्र जो लोगो के मन मे तैयार हुआ है उसका कारण है अनुकरण। लोग, समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति जो करते है उसका या तो फिर जो सिनेमा में दिखाया जाता है उसका अनुकरण करते है और सिनेमा में ऐसा कई बार दिखाया जाता है कि अखाड़े के पहलवान रोज 1 ग्लास नीम के पत्तों का स्वरस पीते है इसलिए वो हट्टे कट्टे रहते है। स्वस्थ रहते है। परिणामस्वरूप साधारण लोग इसे सच एवं स्वास्थ्यवर्धक मानकर रोज कडवे नीम के पत्र का स्वरस पीना शुरू कर देते है। परंतु क्या यह सच है? अगर यह सच होता, तो फिर आयुर्वेद के ऋषि-मुनियों के एकल रसायन द्रव्यों के उपयोग मे इसे श्रेष्ठ (अग्र) स्थान दिया होता। परंतु ऐसा आयुर्वेदीय ग्रंथो मे कही लिखा हुआ नही है।

तो फिर किस आधार पर नीम के स्वरसपान को स्वास्थ्यवर्धक समझा जाता है?
तो इसका एक ही उत्तर है - अज्ञान।

आयुर्वेद के अनुसार नीम यह शुक्रनाशक औषध है। नीम का सेवन शुक्र का क्षय करता है और शुक्र की कमी कामवासना को उत्पन्न होने नही देती। मतलब शरीरोपासना (व्यायाम) या विद्याभ्यास के दरम्यान कामवासना अगर प्रबल हुई तो विद्याभ्यास मे व्यवधान उत्पन्न होने की शत-प्रतिशत संभावना रहती है। इसलिए पहलवानों और विद्यार्थियों को नीम के स्वरसपान की सलाह दी जाती थी। इससे ब्रम्हचर्य का भी अटूट पालन होता था और बिना व्यवधान विद्योपार्जन भी सरलता से होता था। परंतु यह स्वरसपान अल्प मात्रा में करना अपेक्षित होता था, एक ग्लासभर के नही। नीम अत्यल्प मात्रा में ही उत्कृष्ट कार्य करता है, थोड़ी भी मात्रा ज्यादा हो तो वह शुक्रक्षय करता है और कप या ग्लासभर जितनी अधिक मात्रा में लिया जाए तो नीम शुक्र में संरचनात्मक विकृति निर्माण करता है।

नीम का दूसरा मुख्य उपयोग होता है - त्वचारोगों मे। त्वचारोगों मे नीम या नीम के उत्पादों का प्रयोग इतना सामान्य है कि लोग इसके उपयोग के बारे में कभी डॉक्टर की सलाह नही लेते। कोई भी त्वचारोग हुआ कि लोग तुरंत नीम के पत्तो से उबाले हुए पानी से नहाना शुरू कर देते है या फिर उसका स्वरसादी रूप मे आभ्यंतर सेवन करना शुरू कर देते है। मतलब त्वचारोगों के लिए नीम यह एक रामबाण औषधी है, ऐसी लोगों की समझ है। परंतु यह पूर्णसत्य नही है। अगर अकेले नीम से सभी त्वचारोग ठीक हो जाते तो ईश्वर भी सृष्टी की रचना करते वक्त त्वचारोगों के लिए उपयुक्त अन्य औषधियों का निर्माण ही नही करते। अकेले नीम से ही सभी त्वचारोग ठीक हो जाते। इसलिए नीम के बारे मे उपर्युक्त समझ भी मिथ्यामुलक ही है। नीम का त्वचारोगों मे उपयोग जरूर होता है, परंतु अकेला नही, बल्कि अन्य औषधी द्रव्यों के साथ। मतलब जिसे आप सरदार समझ रहे थे, वो सरदार न होकर एक साधारण सैनिक है। परंतु जैसे सिर्फ सरदार अकेला ही युद्ध नही जीत सकता, उसके लिए सैनिकों का साथ होना अत्यावश्यक है। वैसे ही भूमिका चर्मरोगो की चिकित्सा मे नीम की होती है।

आयुर्वेद मे व्याधी की चिकित्सा मे अकेले नीम का बहोत कम उपयोग किया गया है। क्योंकि नीम भले एक उत्कृष्ट औषध हो परंतु उसमे एक दोष है और वो यह कि नीम शुद्ध वातवर्धक भी है और यह वातवर्धकता भी प्रबल है। चूँकि यह वातवर्धन कर्म शुक्रक्षय से विशेष संबंधित होता है, इसलिए नीम स्वरस कि अत्याधिक मात्रा में सेवन करने के बाद शुक्र की संरचना में विकृति निर्माण करने की प्रवृत्ति बलवान रहती है। अतएव किशोरावस्था तथा युवावस्था मे संभव हो इतना नीम का उपयोग टालना ही उत्तम रहता है अथवा अत्यल्प मात्रा मे ही और वैद्यजी के मार्गदर्शन में नीम का उपयोग करे अन्यथा इस काल मे उत्पन्न शुक्रगत विकृती आनेवाले संतानो मे भी संक्रमित होती है।

नीम का उपयोग डायबीटीस मे भी करने की रूढ़ि कई जगह है और वैसे नीम का डायबीटीस मे उपयोग लाभदायी भी देखा गया है। परंतु यह परिणाम डायबिटीज की सिर्फ प्रथमावस्था में ही मिलता है। अतःएव इन सकारात्मक परिणामो को देखकर रुग्ण खुश होकर इसका दीर्घकाल तक सेवन शुरू रखता है, जो बहोत हानिकारक होता है। नीम सिर्फ प्रथमावस्था में ही डायबिटीज को नियंत्रित रखता है, उत्तरकाल में यही दीर्घ उपयोग डायबिटीज में इन्सुलिन की आवश्यकता को उत्पन्न करता है।

आयुर्वेद के अनुसार नीम हृदय के लिए भी हितकर नही है तथा यह पाचनशक्ति का ह्रास भी करता है। अब नीम के इतने सारे दोष पढ़ने के बाद आप को नीम एक हानिकारक औषधि लगेगी। परंतु ऐसा भी नही है। नीम अल्प मात्रा में एक बहोत ही सुंदर एवम कार्यकारी औषधि है। इसका अकेला उपयोग करने की बजाए अन्य औषधियों के साथ ही इसका संयोजन लाभदायक रहता है। इसलिए आयुर्वेद की प्रत्येक औषधि वैद्यजी की सलाहनुसार ही लेनी चाहिए। आयुर्वेद निरापद तभी है, जब उसका सेवन - आचरण एक तज्ञ वैद्य के मार्गदर्शन में किया जाए अन्यथा नीम जैसे सादे औषधि द्रव्य भी हाहाकार मचाने की क्षमता रखते है यह ध्यान रखे। 


अस्तु। शुभम भवतु।


© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत