Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 13 Jun 2019 Views : 636
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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पाश्च्यात्य  आहारशास्त्र  बनाम आयुर्वेद

आहार यह मनुष्य के जीवन का एक महत्वपूर्ण आधारस्तंभ है। जीवनसंतति बनाये रखने के लिए आहारसेवन अत्यावश्यक है। इसलिये पृथ्वीपर जितने वैद्यकीय शास्त्र है उन सभी ने आहार कैसा लेना चाहिए? क्या खाना चाहिए? कब और कितना खाना चाहिए इसके बारे में विस्तार से लिखा है। आयुर्वेद ने भी 5000 वर्ष पूर्व ही आहार एवम सेवनीय द्रव्यों के बारे में विस्तृत विवेचना की है। आधुनिक आहारविज्ञान ने भी अपने स्तर पर इन सभी विषयों पर विवेचन करने का प्रयास किया है। पर चूँकि आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान इनके आहारद्रव्यों को समझने के मापदंड अलग अलग है, इसलिये कई जगह एक ही आहारवस्तु के बारे में दोनो शास्त्रों के मंतव्य में विरोधाभास प्रतीत होता है।

जैसे करडी का तेल। इसे इंग्लिश में safflower oil ऐसा कहते है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार यह तैल सेवन करने से कोई नुकसान नही होता, उल्टा इससे हृदय के स्वास्थ्य की रक्षा होती है। परंतु इसी करडी के तेल के बारे में आयुर्वेद कहता है कि यह तेल अहृद्य है। मतलब यह हृदय के लिये लाभदायक नही है फिर भी आज तो लोग बढ़ा चढ़ा भाव देकर इसे खरीदते है और खाते है।

दूसरा एक द्रव्य भी ऐसा ही है जिसे आयुर्वेद निकृष्ट कहता है पर आधुनिक आहार विज्ञान बढ़ चढ़कर उसके गुणों की प्रशंसा करता है। परिणामस्वरूप आज अधिकतम लोग वजन घटाने के लिए उसका उपयोग करते है। वह द्रव्य है - ओट्स

आयुर्वेद 6 प्रकार के रस (स्वाद, Taste) की व्याख्या करता है, जैसे - मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा और कसैला स्वाद। आहार सेवनकाल में आयुर्वेद सर्वप्रथम मीठा स्वाद अर्थात मधुर रस सेवन करने की सलाह देता है। जब भूख लगती है तो अल्प प्रमाण में वात की वृद्धि होती है। फलस्वरूप कई लोगो को भूख लगने के बाद पीठ दुखना शुरू हो जाती है और जैसे ही भोजन करते है, पीठ दूखना बंद हो जाती है।

आहार में सर्वप्रथम मधुर रस सेवन करने से इस बढ़े हुए वात का शमन होकर पाचन सुचारू रूप से होता है। इसलिये आयुर्वेद भोजन की शुरवात मीठे पदार्थ खाकर करनी चाहिए ऐसी सलाह देता है। वही आधुनिक आहारशास्त्र तो पूरा उल्टापुल्टा ही है। उनके अनुसार मीठे पदार्थ खाने के अंत मे लेना चाहिए। परन्तु अंत भला तो सब भला यह बात सिर्फ व्यवहार में सही है, भोजन में नही, यह बात आधुनिकों को कौन बताये?

शहद के बारे में भी ऐसा ही है। आयुर्वेद शहद को गर्म करने से मना करता है, तो आधुनिक आहारविज्ञान को इसके बारे में कोई नियम कानून पता ही नही। जब चाहे जैसे चाहे शहद खाओ और खाते रहो। ब्रेड के साथ खाओ, आइसक्रीम में डालके खाओ, जैसा मन मे आये वैसा खाओ।

हरी सब्जियों के बारे तो यह विरोधाभास बहोत ही प्रखर है।

आयुर्वेद हरी सब्जियां खाने का विशेष निषेध करता है। मतलब स्वस्थ कौन रहता है, इस प्रश्न के उत्तर में ही आयुर्वेद के आचार्यो ने तीन सूत्र कहे है जैसे
 हितभुक - मतलब जो हितकर आहारविहार सेवन करता है।
मितभुक - मतलब जो जरूरत से थोड़ा कम ही खाता है।
अशाकभुक - मतलब जो शाक अर्थात हरी सब्जियों का सेवन नही करता है।

और आधुनिक आहारविज्ञान ने लोगो के मन पर प्रतिबिंबित किया की जितने सारे विटामिन और मिनरल्स है, वो अधिकतम हरी सब्जियां खाने से ही मिलते है। इसलिये आज भी लोगो मे हरी सब्जियां खाने का क्रेझ इतना है कि लोग गाय भैंस जैसे ग्रीन सलाद ही खाते रहते है। आयुर्वेद के अनुसार हरी सब्जियां अतिमात्रा में खाने से रक्त दूषित होता है और अगर किसी को पहले से ही कोई रक्तविकार है और अगर वो हरी सब्जियां खाता है तो वह व्याधि जल्दी ठीक नही होता।

फल खाने के बारे ने भी आधुनिक आहारविज्ञान और आयुर्वेद के विचार 36 के आंकड़े जैसे है। आयुर्वेद के अनुसार फल खाने के पहले खाने चाहिए, मतलब फलसेवन भोजन का ही शुरुआती अंग है, न कि भोजन से अलग आहार। परंतु आधुनिक आहारविज्ञान के अनुसार फल खाने के बाद खाने चाहिए और पाश्चिमात्यों का अंधानुकरण करनेवाले हम भारतीयों में आज यही आदतें देखने को मिलती है। क्योंकि हमने हमारे अंदर के भारतीयत्व को तिलांजली दे रखी है और आचार विचार से हम पाश्चिमात्य ही बन गए है।
अधिकतम समय यह देखा गया है कि आधुनिक विज्ञान आज जिस बात का पुरस्कार करता है, उसी बात पर अधिक रिसर्च करके कुछ समय पश्चात उसका तिरस्कार भी खुले मन से करता है। मतलब उपरोक्त जितनी बातों को आधुनिक आहारविज्ञान आज स्वास्थ्यप्रद बता रहा है, हो सकता है कि भविष्य में ये बाते उनके शोध में गलत पाई जाए। इसलिये अपने प्राचीन शास्त्र, आयुर्वेद पर विश्वास रखे और तदनुसार ही अपना आहार विहार रखे यही स्वस्थ रहने का रहस्य है। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत