Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu) 16 May 2019 Views : 496
Vaidya Somraj Kharche, M.D. Ph.D. (Ayu)
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सुपारी यह पूर्णतः भारतीय द्रव्य है। प्राचीन संहिताओं में सुपारी का पूगफलम नाम से उल्लेख है तथा इसके गुण अवगुणों की चर्चा है।

आज अगर आप किसी से भी पूछोगे की क्या सुपारी खाना अच्छा है? तो विश्वास रखिये 100 में से 1 भी आपको इस बारे में सकारात्मक उत्तर नही देगा। क्योंकि सुपारी खाने के भयंकर दुष्परिणामों से विश्व आज अच्छी तरह से परिचित है। सरकारी स्तर पर तथा समाजसेवी अपने अपने स्तर पर सुपारी के दुष्परिणामों को प्रोजेक्ट करने में सफल रहे है और इसलिये सुपारी खाने के दुष्प्रभावों को एक अत्यंत सीधा सरल व्यक्ति भी आज अच्छी तरह से जानता है। परंतु इस बात का ध्यान रहे कि सुपारी खाने से कैंसर जैसे जो दुष्प्रभावजन्य रोग उत्पन्न होते हों, वह उसके अतिरेकी सेवन से उत्पन्न होनेवाले रोग है और यह सर्वविदित है कि निरापद वस्तुओं का अतिसेवन भी व्याधि उत्पन्न करने में सक्षम होता है।

आयुर्वेद के अनुसार भोजन के बाद सुपारी खाना चाहिए। भोजन के बाद सर्वप्रथम कुल्ला करके मुंह साफ करे और पश्चात ही सुपारी खाये। परंतु यह भी 500 मिलीग्राम या 1 ग्राम से अधिक नही खानी चाहिए। भोजन के बाद सुपारी खाने का प्रयोजन सिर्फ यही है कि आहार में उपस्थित मधुरादि रसो से मुँह में जो चिपचिपापन आता है, उसे दूर करना होता है। जब आहार में गुलाब जामुन, बासुंदी तथा दूध से बनी अन्य मिठाईयां अधिक मात्रा में होती है, ऐसे भोजन के बाद तो नागरवेल का पान और सुपारी जरूर खानी चाहिए। पान और सुपारी का संयोग अतिमधुर रस सेवन से उत्पन्न होनेवाले अतिरिक्त कफ का नियमन करता है और पाचन सुलभ करता है।

भोजन के बाद तुरंत उसका पाचन होना शुरू हो जाता है और पाचन की इस पहली अवस्था मे कफ बहोत अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है। अतिरिक्त मात्रा में उदिरित ( secreted) यह कफ पाचन में बाधा उत्पन्न कर सकता है, इसलिये भोजन के बाद नागरवेल का पान और उसमे सुपारी डालकर खाने की परंपरा है। नागरवेल का पान और सुपारी इस कफ की मात्रा का नियमन (regulation) करते है, जिससे पाचन सुखपूर्वक सम्पन्न होता है और दूसरे दिन सुबह में मलप्रवृती भी सुलभता से होती है। परंतु पाचन की यह सुखकरता सुपारी की मात्रा पर निर्भर करती है। सुपारी सिर्फ 500 मिलीग्राम से लेकर 1 ग्राम तक होगी तभी यह कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न होता है। अन्यथा अतिमात्रा में यही सुपारी अपने कसैले स्वाद से पाचन में बाधा डालकर कब्ज निर्माण करता है। अतिमात्रा में सुपारी शरीर धातुओ में स्थित ओज को अलग कर देता है। गला रुंध जाता है और शरीर पूरा ढीला पड़ जाता है। अगर ऐसा अतिरेकी सेवन वर्षों तक सतत चलता रहा तो शरीर धातु ओजविहीन होकर नए नए व्याधियों का अड्डा बन जाते है। धातुओ से ओज अलग हो जाने से धातु अपनी व्याधि प्रतिकारक्षमता खो देते है। इसलिये सुपारी सेवन करनेवाले लोगो को तरह तरह के स्वप्रतिरक्षित (Autoimmune diseases) व्याधि उत्पन्न होते हुए देखे जाते है।

सुपारी के अतिसेवन से होनेवाले दुष्परिणाम :

गुटका, मसाला, मसाला पान इत्यादि के साथ जब सुपारी अतिमात्रा में खाई जाती है, तब उसका कसैला रस तथा रुक्ष गुण मुखकुहर (Oral Cavity), गला तथा अन्ननलिका के श्लेष्मल कलाओं (Mucous membrane) की कोशिकाओं (Cells) को प्रकुपित (Irritate) करता है। सतत होनेवाला यह प्रकोपण उन कोशिकाओं को सहन नही होता। क्योंकि मुखकुहर, गला तथा अन्ननलिका की कोशिकाओं की उत्पत्ति सुपारी के अत्याचार को झेलने के लिए नही हुई होती है। बल्कि उनका कार्य तो सेवन किये हुए अन्न को गीला कर उसे पेट मे सुखपूर्वक पहुचाने का रहता है। परंतु सुपारी खानेवाले के शरीर मे इन कोशिकाओं का पाला अन्न से कम और सुपारी से ही ज्यादा पड़ता है। इसलिये सुपारी से उत्पन्न होनेवाले इस प्रकोपण को सहन किया जा सके ऐसे बदलाव फिर ये कोशिकाएं अपने आप मे कर देती है। इन्ही बदलावों को हम आज 'कैंसर होना' कहते है। मतलब सुपारी खाना कैंसर का कारण नही है। बल्कि अतिमात्रा में नियमित एवम लंबे समय तक सुपारी खाना यह मुख, जीभ, गला तथा अन्ननलिका के कैंसर का कारण है।

सुपारी के ऐसे ही अनियंत्रित सेवन से संधिवात, मधुमेह, दृष्टिदोष, पाचन के विकार, कब्ज, मुँह तथा जीभ पर व्रण होना, तरह तरह के दंतविकार और मसूड़ों के विकार उत्पन्न होते है। इसके सिवा अनेक प्रकारके स्वप्रतिरक्षित व्याधि जैसे Autoimmune thyroiditis, Sjogrens Syndrome, Parkinson's disease, Alzheimer's disease Myesthenia gravis जैसे व्याधि भी उत्पन्न होते है। इसलिये सुपारी का अत्यल्प मात्रा में ही सेवन करना हितकर होता है। उसमे भी सेकी हुई सुपारी उत्तम होती है। जो कम अवगुण करती है।

सुपारी के दुष्प्रभाव तत्काल दूर करने का उपाय :

कच्ची सुपारी खाने के बाद गला तुरंत चोकअप हो जाता है और संधिबंधन ढीले पड़ जाते है, मतलब हाथ, पैर शिथिल हो जाते है। कुछ देर तक कुछ भी सूझता नही। ऐसे वक्त तुरंत घर पर बनाया हुआ घी पी लेना चाहिए। जिससे सभी लक्षण तत्काल रूप से शांत हो जाते है। घी की अनुपलब्धता में, दूध का भी सेवन किया जा सकता है।
सुपारी के इन गुण तथा अवगुणों को ध्यान में रखकर ही उसका मात्रावत सेवन करना हितकर होता है। अस्तु। शुभम भवतु।

© श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगांव 444303, महाराष्ट्र, भारत