स्वामीआयुर्वेद स्वास्थ्यसूत्रमाला - 50

आधुनिक दिनचर्या भाग 1 - चाय सेवन

आयुर्वेदीय दिनचर्या मे चाय जैसे पेय पदार्थ के सेवन का कही भी कोई उल्लेख नही। इसलिए दिनचर्या की इस श्रृंखला मे आधुनिक जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन चुँके कुछ दैनिक कर्मों का आधुनिक दिनचर्या के अंतर्गत वर्णन किया जा रहा है। चाय, प्रातःकालीन अल्पाहार (Breakfast) माध्यन्होत्तर अल्पाहार (Snacks) यह सभी प्रवृत्तियाँ इस आधुनिक दिनचर्या मे समाहित है।

चाय भारतीय पेय नही है। यह ब्रिटिशों द्वारा भारत मे लाया गया है। इसलिए चाय को पहले पहले किसी भी भारतीय ने अपनाया नही। परंतु बाद मे ब्रिटिशों ने चाय को यात्रा स्थलों पर, रेल्वे स्टेशनों पर मुफ्त मे बाँटना शुरू किया और साथ मे चाय के उपयोगी गुणधर्मों को लेकर भारतीय जनता का ब्रेनवॉशिंग भी शुरू किया। परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिशों के काल मे भी और उनके जाने के बाद आज भी चाय पीने मे हम भारतीयों को गर्व की अनुभूति होती है। ब्रिटिशों के प्रचार से प्रभावित होकर भारतीयों ने चाय को प्रातःकालीन पेय के रूप मे अपनाना शुरू किया और वर्तमान स्थिती तो यह है की चाय भारतीय समाज मे मानापमान की वस्तु बन गयी है। अगर आप किसी के घर गये और यजमान ने आपको चाय का भी नही पूँछा (फिर भले ही आप चाय न पीते हो, तो भी) तो मेहमान को यह अपना अपमान लगता है। इस तरह से चाय आज भारत के लोगो के साथ एकरूप हो गया है। परन्तु वर्तमान पीढी को तो चाय विदेशी है, ऐसा सोचना भी कोई कविकल्पना से कम नही लगता होगा।

आज की स्थिती मे भारत मे कुछ गिनेचुने लोग ही ऐसे होंगे, जो चाय नही पीते हो। चाय अब एक सामान्य भारतीय मनुष्य की आवश्यकता बन गया है। एक गरीब आदमी के लिए चाय एक ऊर्जा का स्त्रोत है। तनतोड मेहनत करनेवाले मजदूरो के पास ग्लूकोज शरीर मे डालने का एकमात्र सस्ता साधन चाय का सेवन होता है। इसलिए मजदूरों मे या अन्य मेहनत का काम करनेवाले लोगों मे चाय सेवन करने का प्रमाण अत्याधिक पाया जाता है। चाय अभी रोजमर्रा के जीवन का ऐसा अंग बन गया है की इसके सेवन से कुछ दुष्परिणाम हो सकते है ऐसा कोई सोच भी नही सकता। परंतु ध्यान से अगर देखा जाये तो आजकल पेट तथा पाचन से संबधित जितनी समस्याए है, उनमे से 30-40% जितनी समस्याओं को उत्पन्न करने का कार्य अकेला चाय ही करता है। चाय के निम्नलिखीत गुणकर्मों का संक्षिप्त परिशीलन आपको इन दुष्परिणामों से अवगत करायेगा ही।

चाय के गुणकर्म तथा परिणाम :-

चाय चूँकी भारतीय नही है। इसलिए प्राचीन आयुर्वेदीय ग्रंथों मे चाय के गुणकर्मों का वर्णन नही मिलता। परंतु अनगिनत बार असंख्य लोगो द्वारा उपयोग मे लाए जाने के बाद अब चाय के गुणकर्मों की स्पष्ट उपलब्धी हो गई है।

चाय स्वाद मे कसैला (कषाय) तथा कडवा (तिक्त) होता है। यह उष्ण वीर्य तथा रुक्षगुणप्रधान द्रव्य है। इसलिए चाय के सेवन से मनुष्य शरीर मे वात दोष बढता है। आजकल छोटे बच्चे तथा किशोरों मे भी वातव्याधियाँ देखने को मिलती है। चाय का सेवन उन वातव्याधियों के अनेक कारणों मे एक कारण होता है। चाय उष्ण प्रधान होने के कारण शीत प्रदेशों में ही पीने योग्य होता है। भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देश की जनता के लिए ऐसे पेयपदार्थ अनुकूल नही होते। फिर भी अगर सेवन किया जाए तो चाय अपने उष्ण गुण तथा द्रवत्व के कारण पाचनशक्ति को मंद एवं दुर्बल कर देता है। कसैला स्वाद (कषाय रास) तथा संबंधित रुक्ष गुण अग्नि को और मंद कर देता है। यही रुक्षता आंत्र में निर्माण होनेवाले मल को और ज्यादा सुखा देते है। इसलिए चाय के सेवन से अम्लपित्त जैसे पाचनतंत्र की विविध समस्याए उत्पन्न होती है और कब्ज निर्माण होता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार चाय मे कैफीन (caffeine) नाम का एक रसायन होता है। यह रसायन (chemical) नशीले द्रव्यों की श्रेणी मे आता है। इसलिए ही चाय पीने के बाद पीनेवालों को त्वरित क्षणिक स्फुर्ती का अनुभव होता है। शरीर मे नये उत्साह का संचार होता है। कैफीन जैसे इस नशीले रसायन की उपस्थिती की वजह से ही लोगों मे चाय की लत (Addiction) देखी जाती है। मतलब जब तक चाय पियेंगे नही, तब तक चैन नही मिलता। अन्यथा सिरदर्द (Headache), बेचैनी (Restlessness), किसी भी काम मे मन एकाग्र नही होना जैसे लक्षण उत्पन्न होते है।

चाय में टैनिन नाम का भी एक रसायन होता है। चाय को कसैलापन इसी रसायन की वजह से प्राप्त होता है। आयुर्वेदोक्त रुक्ष गुण का आधार भी यही रसायन रहता है। इसी रसायन की वजह से शरीर मे वातप्रकोप होता है। टैनिन का यह दुष्परिणाम कम करने के लिए ही चाय में शक़्कर तथा दूध मिश्रित किया जाता है। काढ़े की तरह उबालकर जब चाय बनाया जाता है, तब टैनिन बहोत ज्यादा मात्रा मे चाय मे उतरता है। इसलिए भारतीय पद्धती से उबालकर बनाये हुये चाय के सेवन से अग्निमांद्य, अजीर्ण, अम्लपित्त, अरुचि, मुँह मे छाले, बार बार डकार आना, पेट मे गुड़गुड़ आवाज आना, पेट फूलना आदि व्याधिप्रकार उत्पन्न होते है। पहले पहले तो यह व्याधिप्रकार उचित औषधोपचार से शांत हो जाते है। परंतु बाद बाद मे यही स्थिती औषधोपचार को भी प्रतिक्रिया (response) नही देती। इसका कारण अतिमात्रा मे सेवित यह टैनिन पाचकस्त्रावों का स्त्रवन मंद कर देता है। आमाशय की श्लेष्मल कला का शोष (atrophy) उत्पन्न करता है। आमाशय तथा आंत्र मे कालांतर में रुक्षता तथा दुर्बलता उत्पन्न करता है।

वस्तुतः उपरोक्त सभी लक्षण तभी उत्पन्न होते है, जब चायपान का अतिरेक किया जाता है और चूँकी चाय बनाने की जो भारतीय पद्धती है वही मूलतः गलत है। इसलिए भारतीय लोगों मे चायपान से संबंधित विकृतिया ज्यादा देखने को मिलती है।

चाय बनाने का सही तरीका :

ब्रिटिश भारत मे चाय तो लेके आए। पर भारतीयों ने चाय बनाने की मूल पद्धती ही बदल दी। आज भारत मे चाय पत्ती को पानी मे काढे जैसा उबालकर उसमे शक्कर और दूध मिलाया जाता है। परंतु मूलविधी इससे थोडी अलग है।

चाय बनाते वक्त सबसे पहले पानी को स्टील या मिट्टी के बर्तन मे ख़ौलता हुआ गर्म कर लो। फिर बर्तन नीचे उतारकर उस गर्म पानी मे आवश्यक जितनी चायपत्ती डाले। थोडी देर उस बर्तन को ढँक लो। फिर एक आधे मिनीट के बाद उस मिश्रण को थोडा हिलाकर छननी से छान ले और इस छाने हुए मिश्रण मे स्वादानुसार शक्कर तथा दूध मिलाकर गरमा गरम पीये। ऐसा करने से चाय के पत्तो मे उपस्थित उडनशील तैल यथावत रहते है और शरीर को उनका लाभ भी मिलता है। चाय के उष्ण तथा रुक्ष गुणों का शरीर पर दुष्परिणाम भी देखने को नहीं मिलता।

भारतीय पद्धती से उबालकर पीने से चाय के पत्ती मे स्थित टैनिन तथा कैफीन ज्यादा मात्रा मे चाय मे उतरता है। इसी के परिणामस्वरूप उपर उल्लेखित व्याधियों की उत्पत्ति होती है। इसलिए आदर्शरूप मे तो चाय का सेवन ही नही करना चाहिए। परंतु अगर सेवन करना ही हो, तो पाश्चिमात्य पद्धती का उपयोग करके ही चाय बनाना चाहिए।

चाय सेवन के कुछ साधारण नियम :

1) चाय स्टील या मिट्टी के बर्तन मे ही बनाए।

2) संभव हो तो तब तक, ठेले पर बनाई चाय न पीये। क्योंकि एक तो ठेले पर चाय अल्युमिनीयम की किटली मे बनाते है और गर्मागर्म परोसने के लिए उसे बारबार उबालते रहते है। कई ठेलेवाले तो चायपत्ती को सुखा सुखाकार पुनः पुनः उपयोग मे लाते है। कई शहरों मे चायवाले चाय मे भांग जैसे नशीले पदार्थ अत्यल्प मात्रा मे मिलाते हुए पाये गए है। जिससे चाय पीनेवाला बारबार उनके ही ठेले पर आता रहे।

3) चाय के साथ ब्रेड, पाव, नमकीन, रोटी ऐसा कुछ न खाये।

4) चाय ताजा बनाकर ही पीये। एक बार बनाए हुए चाय को बारबार न उबाले।

5) चाय स्वतः उष्ण गुणवाला है। इसलिए चाय मे उपर से अद्रक, सोंठ, काली मिर्च, तुलसी, हरी चाय जैसा कुछ न मिलाये। इससे पित्त प्रकुपित होकर रक्त दूषित होने की ज्यादा संभावना रहती है।

6) चाय बारबार और अत्याधिक मात्रा मे न पीये। पीना ही हो, तो सुबह एक बार लेना ही पर्याप्त होता है। ग्राहक के साथ हमे भी पीना पडता है, अन्यथा शिष्टाचार संगत नही लगता, ऐसी लंगडी दलीले न दे।

7) चाय पीने के तुरंत पहले या बाद मे सादा/ठण्डा पानी न पीये। न ही ठन्डे पानी से कुल्ला करे।

8) चाय पीने के बाद गुटका, मसाला, पान, तम्बाकू न खाये।

अस्तु। शुभम भवतु।

Ⓒ श्री स्वामी समर्थ आयुर्वेद सेवा प्रतिष्ठान, खामगाव 444303, महाराष्ट्र, भारत

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